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नाजुक उम्र

मेरे पास एक स्कूल के प्रिंसिपल का एसएमएस आया। लिखा था- जब माता-पिता इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि उनका बच्चा उनके प्यार के काबिल नहीं रहा,  यही वह समय होता है, जब उस बच्चे को उनके प्यार की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। यह स्थिति अधिकतर किशोरावस्था में आती है। हम उम्र दोस्तों के साथ मिलकर ये बच्चे स्कूल के लगभग सभी अध्यापकों को अपने खिलाफ कर लेते हैं। माता-पिता तक जब शिकायत पहुंचती है, तो वे निराश हो जाते हैं। वे माता-पिता, जो अपने बच्चों के लिए सारी सुख सुविधाएं जुटाने के वास्ते दिन-रात पिसते हैं, यह सोचकर कि बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे। वे इन बच्चों के लिए लैपटॉप और टेबलेट वगैरह जुटाते हैं, और बच्चे उन पर खेलते हुए बड़ों के धैर्य की परीक्षा लेते हैं। इस उम्र में कुछ अचानक बागी भी हो जाते हैं। मां-बाप भौंचक और विवश हैं, उनका लाडला यह कर बैठेगा, इसका उन्हें अंदाज भी नहीं था।

दूसरी ओर, वह बच्चा इस बात परेशान है कि उसे बात-बात पर टोका क्यों जाता है? मम्मी-पापा इतने अजनबी क्यों होते जा रहे हैं? एक तरफ मां-बाप हैं और दूसरी तरफ बच्चा, दोनों एक-दूसरे के व्यवहार से उलझन में फंसे हुए। मां-बाप की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है। वे उग्र होकर बच्चे को अपने प्यार के सुरक्षा-चक्र से बाहर कर देना चाहते हैं। यही समय पूरे पालन-पोषण की परीक्षा का होता है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जिन बच्चों को मां-बाप हर हाल में स्वीकारते हैं, उनमें आत्म-गौरव का भाव अधिक होता है। किशोर बहुत भावुक होते हैं और बात-बात पर बगावत उनकी उम्र की फितरत है। बस कुछ सावधानियां जरूरी हैं। उन्हें अपनी अधूरी महत्वाकांक्षा पूरी करने का माध्यम न बनाएं। उन्हें ध्यान से सुनें। उनके फैसले अगर बहुत समस्या न पैदा करते हों,  तो उनका सम्मान करें। उन्हें जिम्मेदार मानें, तो वे जिम्मेदारी उठाना भी सीख जाएंगे।       

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