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सफाई और ईमानदारी

भारत में इन दिनों सफाई अभियान की बड़ी चर्चा है। महात्मा गांधी ने सफाई को आजादी के आंदोलन का हिस्सा बना दिया था। गांधीजी ने यह पहचाना कि बाहर की गंदगी का रिश्ता भीतर की गंदगी से है। अगर भारत में गुलामी, अशिक्षा,  कुरीतियों की गंदगी है,  तो इसे हटाने के लिए भौतिक रूप से सफाई का अभियान भी चलाना होगा। जो समाज अपने आसपास पड़ी गंदगी को बर्दाश्त करता है,  वह अपनी सामाजिक,  सांस्कृतिक और राजनीतिक गंदगी को भी बर्दाश्त कर लेगा। इसी से प्रेरणा लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्वच्छ भारत अभियान चलाया है। यह बात एक ताजा अध्ययन से भी साबित हुई है कि दफ्तर साफ-सुथरे होते हैं,  तो वहां के कर्मचारियों में परस्पर सहयोग और खुलेपन का जज्बा ज्यादा होता है। साफ-सुथरे स्थानों पर काम करने वाले लोगों के ईमानदार होने की संभावना काफी होती है। इसके बरक्स गंदे कार्यस्थलों में लोगों के स्वार्थी,  आत्मकेंद्रित और कम ईमानदार होने की आशंका होती है।

यानी मुमकिन है कि भारत में जो सार्वजनिक गंदगी है,  उसका कोई रिश्ता सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार से भी हो। सरकारी दफ्तरों में जितना भ्रष्टाचार होता है और आमतौर पर कर्मचारियों के तल्ख और असहयोगी होने की शिकायत होती है, क्या उसकी वजह कुछ हद तक सरकारी दफ्तरों की रंग उड़ी दीवारों, गंदे फर्श, धूल जमी फाइलें और टूटे-फूटे फर्नीचर की वजह से बदरंग माहौल में ढूंढ़ी जा सकती है? शोधकर्ताओं का कहना है कि गंदे माहौल से वहां काम करने वाले लोगों में एक तरह से घृणा और अप्रसन्नता का भाव बना रहता है। जब व्यक्ति अपने माहौल में खुश और सहज नहीं महसूस करता, तो वह अपने में सिमट जाता है। इससे वह स्वार्थी और आत्मकेंद्रित हो जाता है और दूसरों  के प्रति असंवेदनशील या शत्रुतापूर्ण नजरिया विकसित कर लेता है। बेईमानी या भ्रष्टाचार की जड़ें सिर्फ अपने स्वार्थ की फिक्र और दूसरों के या सार्वजनिक हित के प्रति संवेदनहीनता में होती है।

इसके बरक्स साफ-सुथरे और खुशनुमा माहौल में व्यक्ति खुश और सहज महसूस करता है। ऐसे में, वह अपने सहयोगियों या अन्य लोगों की मदद करना चाहता है और ज्यादा ईमानदारी से काम करता है। यानी बाहर का माहौल साफ-सुथरा और खुशनुमा होगा, तो मन के अंदर भी साफ-सुथरे और खुशनुमा ख्याल आएंगे। यह कोई संयोग नहीं हो सकता कि बुरे और दुष्ट विचारों और भावों के लिए भी हम ‘गंदगी’ शब्द का ही इस्तेमाल करते हैं। अच्छे चरित्र के व्यक्ति के लिए ‘साफ-सुथरा चरित्र’ की संज्ञा इस्तेमाल करते हैं और दुष्ट चरित्र के आदमी को ‘गंदा आदमी’ कहते हैं। शोध से भी यही पता चलता है कि सफाई पर जोर दिया जाए, तो उसका अच्छा असर लोगों के स्वभाव पर भी पड़ता है।

अगर कर्मचारी अपने काम से और अपनी कार्य-संस्कृति से खुश नहीं है, तो उसका असर आसपास के माहौल में गंदगी के रूप में दिखाई दे सकता है। अगर कहीं गंदगी है या लोग गंदगी फैला रहे हैं, तो इसका मतलब है कि लोग अपने माहौल के प्रति आत्मीयता नहीं महसूस करते। जो जगह हमें पसंद होती है, उसे हम गंदा या कुरूप नहीं बनाना चाहेंगे। इस मायने में सफाई लोगों को दूसरे लोगों और अपने माहौल के प्रति ज्यादा जिम्मेदार बनाने में भी कारगर हो सकती है। शोध से पता चलता है कि गंदगी का रिश्ता आदमी के स्वार्थी होने से है और सफाई का रिश्ता उसके दूसरों के प्रति संवेदनशील और मित्रतापूर्ण होने से है। यानी सबसे बड़ी गंदगी स्वार्थ है और सफाई सबके हितों की चिंता है। हम जब अपने वातावरण से कूड़ा हटा रहे होते हैं, तो अपने मन-मस्तिष्क की भी सफाई करते हैं।

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