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मजम्मत और मरम्मत

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते को उतार-चढ़ाव भरा बताया जाता है। कई बार तो यह उतार बेहद गहरे तक चला जाता है। दहशतगर्दी रूपी साझा दुश्मन से जंग लड़ते ये पड़ोसी मुल्क अपने रिश्तों में स्थिरता न लाकर,  बल्कि कभी-कभी दुश्मनी बढ़ाकर अपने लिए बड़ी समस्या खड़ी कर लेते हैं। यह वह हकीकत है,  जिससे सरहद के दोनों पार के अफसर सहमत होंगे,  अलबत्ता यह मुमकिन है कि इसकी वजहों के मामले में उनके बीच असहमति हो। ऐसे में,  अफगानिस्तान के नए सदर अशरफ घनी का पाकिस्तान दौरा बेहद मायने रखता है। पाकिस्तान उन मुल्कों में एक है,  जिसे घनी ने अपने दौरे के लिए चुना है। यह उनकी कूटनीति और विदेश नीति की प्राथमिकताओं का खुलासा करता है। यह दौरा इस एहसास से निकला है कि तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान की जंग इस्लामाबाद की मदद के बिना नहीं जीती जा सकती है। इसके अलावा,  हैरतअंगेज चुनौतियों के खिलाफ अपनी पूरी ताकत झोंकने से पहले अहम पड़ोसी से अमन का रिश्ता वाकई जरूरी होता है। एक बात और। घनी से पहले अफगानिस्तान के सदर रहे हामिद करजई का रिश्ता इस्लामाबाद से अच्छा नहीं था।

इसलिए इस बार दोनों तरफ से हालात में बदलाव की चाहतें हैं और इससे एक खुशनुमा माहौल बनता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि दोनों मुल्कों के पास आपसी मदद के ढेर सारे मौके और संभावनाएं हैं और जो कमी है,  वह सियासी इच्छाशक्ति की है। हाल के हफ्तों में पाकिस्तानी विदेश मंत्री,  आर्मी चीफ और नए खुफिया प्रमुख मेल-मिलाप और मदद के पैगाम के साथ काबुल के दौरे पर गए थे। पाकिस्तानी फौज ने अफगान जवानों को प्रशिक्षण और हथियार देने की पेशकश की है। अगर यह पेशकश मान ली जाती है,  तो रिश्तों को एक नई ऊंचाई मिलेगी,  क्योंकि दोनों तालिबान के खिलाफ लड़ रहे हैं और फौजी मदद से समान रणनीति बनेगी। पाकिस्तान के खिलाफ तालिबान को चोरी-छिपे मदद देने का इल्जाम है। दूसरी तरफ,  पाकिस्तान इसका दोष अफगानिस्तान के सिर मढ़ता आया है। ऐसे में, रिश्तों की मजम्मत नहीं,  बल्कि मरम्मत की जरूरत है।   
द पेनिनसुला,  कतर

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