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आपको क्या चाहिए अहं या खुशी?

अहं का सूत्र है- ज्यादा और ज्यादा। यह कभी तुष्ट नहीं होता। इसी कारण व्यक्ति रुकने का नाम नहीं लेता,  जबकि वास्तविकता में मंजिल पर पहुंचने के कई पल सामने आ चुके होते हैं। जब आप ‘और ज्यादा’ के चक्कर में पड़ना बंद कर देते हैं, तो आप मंजिल तक आसानी से पहुंचते हैं और उसके बाद के मौकों को दूसरों के लिए छोड़ देना सीख जाते हैं, क्योंकि आप जान चुके होते हैं कि आपको खुशी-खुशी जीने के लिए ‘बहुत ज्यादा’ नहीं चाहिए।

अक्सर हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे मन-मस्तिष्क पर एक अदृश्य शक्ति अपना अधिकार बना चुकी है। हमारा सारा व्यवहार और सोच उसके अनुसार चलता है। यह है अहं की भावना। स्व-महत्व के बोध से जन्मी यह भावना हमें हमारी प्रवृत्तियों से विपरीत शैली में जीने को प्रेरित करती है। नतीजतन हम एक अनवरत संघर्ष में फंस जाते हैं। इस भावना से मुक्त होने के मेरे कुछ मंत्र इस तरह से हैं-

मान क्या,  अपमान क्या?
जब अपमान अनुभव होता है,  तो हमारी चेतना प्रभावित होती है। यह आपको कमजोर बना देता है। अगर आप अपमानित न होने के प्रति अति सतर्क रहते हैं,  तो आपको हर बात में अपमान महसूस हो सकता है। अगर आपको दुनिया बुरी लगती है,  तो यकीन मानिए कि यह धारणा अहं से उपजी है। हर वक्त अपनी मानहानि पर केंद्रित रहेंगे, तो आप उसी ऊर्जा का निर्माण करेंगे,  जिसने आपको अशांत किया है। इस तरह आप विरोध,  फिर आक्रमण और फिर एक और आक्रमण करने के दुष्चक्र का शिकार हो जाते हैं। 

जीतने की जरूरत क्या है?
हमारा अहं लोगों को विजेता और पराजित के वर्गों में विभाजित करता है। हर वक्त तो कोई जीत नहीं सकता। कोई न कोई आपसे बेहतर निकलेगा ही। नतीजा होगा कि तब आप स्वयं को मूल्यहीन महसूस करने लगेंगे। पर क्या आपका अस्तित्व जीत मात्र में है?  जीतने का आनंद उठाएं,  उसे लत न बनाएं। इस संसार में कोई पराजित नहीं होता। बस, तुलना में हम अलग-अलग स्तरों पर खड़े दिखते हैं। जीतने की धुन अहं से उपजा एक डर होती है। इसके बजाय आसपास देखें,  दृश्यों और जीवन का आनंद लें। एक शांत अवस्था में आएं। मजेदार बात यह है कि जितना कम जीत के पीछे भागेंगे,  उतना ज्यादा जीत आपके हाथ लगेगी।

सही की गलत तलाश
अहं अक्सर दूसरों को गलत और खुद को सही बताने को प्रेरित करता है। तब आप आक्रामक हो जाते हैं। ऐसे में आप अपनी अंतरात्मा से दूर होते जाते हैं। अपने रिश्तों और चर्चाओं में जब आप मन ही मन खुद से कहते हैं- ‘मैं अहं का दास नहीं हूं। मैं सामने वाले को यह मौका दूंगा कि वह भी सही साबित हो सके और उसे धन्यवाद करूंगा कि उसने मुङो सही राह दिखाई।’ - तब आप अहं से दूर अंतरात्मा के पास होते हैं। मैंने कई रिश्ते ‘सही साबित होने की ललक’ में खत्म होते देखे हैं। इसके बजाय खुद से पूछें- ‘मुझे क्या चाहिए? सही होने का अहं या कि खुशी।’ अगर आप खुशी का चयन करते हैं,  तो यकीन मानिए पूरा ब्रह्मांड आपको उस जीवन को रचने में मदद करेगा,  जिसे आप रचना चाहते हैं।

त्यागें श्रेष्ठता का बोध
दूसरों से बेहतर होना कोई बड़ी बात नहीं है। पर खुद को पहले से बेहतर बना लेना वाकई विकास कहलाएगा। श्रेष्ठ होने की अपनी इच्छा को त्याग दें। जब आप अपनी श्रेष्ठता की भावना दर्शाते हैं,  तो यही आपको बदले में भी मिलती है। खुद को श्रेष्ठ साबित करना तुलना से शुरू होता है,  जो दरअसल अपनी कमी देखकर दूसरों में भी उसे ढूंढ़ने से शुरू होती है और नतीजतन आप अपनी और कई कमियों से परिचित होकर उलझते जाते हैं।

उपलब्धियां आपका परिचय नहीं हैं
हम केवल  शरीर और इसके सुख के लिए जिम्मेदार चीजों मात्र में बंटे नहीं हैं। हमारा परिचय इससे कहीं अधिक गहरा होता है। आपकी हैसियत आपका सच्चा और स्थायी परिचय नहीं है। अपने चरित्र की जिम्मेदारी लें। जब आप उपलब्धियों का कारण खुद को नहीं मानते,  तो आप प्रयासों के महत्व को समझना शुरू करते हैं और इस राह पर उपलब्धियां भी होती चलती हैं।

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