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राजनीतिक लफ्फाजी और विकास

पिछले दिनों टेलीविजन पर मनोरंजक राजनीतिक कार्यक्रम देखने को मिला। जम्मू-कश्मीर के डोडा से एक चैनल ने विभिन्न दलों के प्रत्याशियों को बुलाकर कुछ सवाल पूछे। सतही आरोप-प्रत्यारोप के इस सिलसिले में एक लफ्ज रह-रहकर गूंजा- ‘विकास’। हर पार्टी का नुमाइंदा तोते की तरह सिर्फ इसी शब्द को रट रहा था। सत्तारूढ़ दल के लोगों के पास लिस्ट थी। वे बताने से ज्यादा जता रहे थे कि उनकी पार्टी ने क्या कमाल किया है!  विपक्षी उन्हें गलत साबित करने पर जुटे थे। इस तमाम हल्ले-गुल्ले से दो बातें साबित हुईं। पहली,  इस प्रायोजित सियासी कव्वाली से जनता और उसके हित नदारद थे। दूसरी,  हमारी राजनीति और उसके खेवनहार देश की मौजूदा बदहाली के सबसे बड़े जिम्मेदार हैं। एक बानगी देखिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन महीने पहले सांसदों से अनूठी ख्वाहिश व्यक्त की थी। उन्होंने कहा कि दोनों सदनों के माननीय सदस्य एक-एक ग्राम का चयन करें और इसके विकास के लिए पूरी कोशिश करें। देश में कुल 776 निर्वाचित सांसद हैं। तय है। यदि ये सिर्फ एक गांव के विकास में जुट जाएं,  तो उससे उस गांव का ही नहीं,  समूचे इलाके का भला होगा। इस योजना को नाम दिया गया- सांसद आदर्श ग्राम योजना। होना तो यह चाहिए था कि हमारे माननीय सांसद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इसका स्वागत करते और जिला प्रशासन को अपनी पसंद के गांव की तुरंत इत्तला दे देते।

‘हिन्दुस्तान’ को अंदेशा था कि ऐसा नहीं होगा। लिहाजा हिंदी हृदय प्रदेश में फैले हमारे दजर्नों संवाददाताओं ने इस पर नजर रखनी शुरू कर दी। मालूम था कि 11 नवंबर को हमें कुछ अनोखे आश्चर्यों का सामना करना पड़ेगा। ऐसा ही हुआ। समय-सीमा बीतने तक 776 में से 463 यानी आधे से ज्यादा माननीय इस नेक काम को नहीं कर सके। कुछ तो ऐसे थे,  जिन्होंने ऐन समय पर अपनी पसंद जिलाधिकारी को लिख भेजी। नौ नवंबर तक इन 776 माननीयों में से करीब 80 ही अपनी पसंद का इजहार कर सके थे। बाकी को जैसे इस अवधि के खत्म होने का इंतजार था। कुछ ऐसे भी थे,  जिन्होंने तकनीकी तौर पर गलतियां कर दीं,  उनकी ख्वाहिश खारिज कर दी गई। मजबूरन केंद्र सरकार को बचे हुए महानुभावों के लिए समय-सीमा एक हफ्ता बढ़ानी पड़ी।

सुखद आश्चर्य!  उत्तर प्रदेश और बिहार के सांसदों ने इस मामले में अपनी सक्रियता से उन लोगों को निरुत्तर किया,  जो इन सूबों की राजनीतिक संस्कृति पर तंज कसते हैं। उत्तर प्रदेश के 80 में से 70 और बिहार के 40 में से 36 लोकसभा सदस्यों ने तय समय के भीतर गांवों का चुनाव कर लिया था। यहां भी हम हिंदी वालों का अंतर्विरोध कायम रहा। विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़े झारखंड के सिर्फ दो सांसदों ने यह दायित्व निभाया। क्यों? सनातन विपन्नता से जूझ रहे इस प्रदेश को ऐसी इमदाद की सख्त जरूरत है। उम्मीद है कि वहां के मतदाता इन चुनावों के दौरान अपने सांसदों से इस बारे में जरूर जवाब-तलब करेंगे। इस लापरवाहीपूर्ण रवैये ने कई पीड़ादायक सवालों को जन्म दिया है। क्या हमारे सांसद ग्रामीण विकास में रुचि नहीं रखते?  क्या वे नहीं जानते कि ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’  उनके जरिये सिर्फ एक गांव का भला नहीं करेगी?  जो लोग गांवों से आते हैं,  वे जानते हैं कि हमारे गांव आपस में जुड़े हुए हैं। यदि एक को सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधा मिलेगी, तो आसपास के दजर्न भर गांव इससे लाभान्वित होंगे। क्या हमारे सांसदों को इतने सारे लोगों की प्रगति की परवाह नहीं है?

इसी तरह,  जिनकी पसंद रद्द कर दी गई,  उन्हें क्या तकनीकी मुद्दों का इतना भी ज्ञान नहीं है कि वे मानकों का मूल्य समझ सकें?  जो लोग नियम-कायदे बनाने के लिए अधिकृत हैं,  यदि वे ही उन्हें उपेक्षा से देखेंगे,  तो भला देश में अमन-ओ-अमान की स्थापना कैसे होगी?  क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जिन सांसदों ने अपनी पसंद नहीं बताई, उन्होंने जनता के सामने आकर इसका स्पष्टीकरण देने की भी जरूरत नहीं समझी। क्या हमारे माननीय सांसद आम लोगों के प्रति अपनी जवाबदेही नहीं समझते?  क्या देश के विकास के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है?  यहां मैं इस निबंध की शुरुआत में उठाए गए मुद्दे की ओर वापसी की इजाजत चाहूंगा। हम हर चुनाव में एक घिसी-पिटी नौटंकी देखने को अभिशप्त हैं।

सत्तारूढ़ दल के लोग आते हैं और बताना शुरू कर देते हैं कि उन्होंने क्षेत्र,  राज्य अथवा देश के विकास के लिए क्या-क्या नहीं किया?  विपक्षियों से इसका ठीक उल्टा सुनने को मिलता है। विकास न हुआ, थाली का बैंगन हो गया, जिसे राजनेता जब और जैसा चाहें,  वैसा घुमा दें? यह दुखद सिलसिला रुकना चाहिए, पर कैसे? अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों के ‘रिकॉल’ की मांग उठाई थी। इस गरीब देश में चुनाव अपने महंगेपन के कारण जहां जानलेवा महंगाई और मुद्रास्फीति लेकर आते हैं,  वहां ‘रिकॉल’ जैसी व्यवस्था सिर्फ ख्याली पुलाव है। इसका एक ही उपाय रह बचा है। हमें जन-प्रतिनिधियों को घेरना होगा। उनसे पूछना होगा कि वोटों के एवज में आपने हमारे लिए क्या किया?  वे जब मतदान के लिए दरवाजा खटखटाएं,  तो उन पर सवालों की झड़ी लगानी होगी। आखिर कभी तो वे जवाबदेही महसूस करेंगे।

जन-प्रतिनिधियों के उत्तरदायित्व पर याद आया। स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक की कार्यवाही पर नजर डाल देखिए। जब सदन चल रहा होता है,  तो विपक्षी उसमें व्यवधान पैदा करते हैं। इस अंधी दौड़ में सभी पार्टियां शामिल हैं। इसीलिए जो बहस संसद में होनी चाहिए,  वह टीवी स्टूडियो में होती है। ऐसा करते समय हमारे माननीय भूल जाते हैं कि यह गलत है। सदन की कार्यवाही इतिहास बनाती है,  आने वाली पीढ़ियां उससे आलोकित होती हैं। हम ‘राम-राज्य’ को क्यों याद करते हैं?  इसकी अकेली वजह यह है कि रघुनन्दन श्रीराम को राज-पाट तो विरासत में मिला, पर उन्होंने जन जवाबदेही को पूरी पारदर्शिता के साथ निभाया। कल्पना करें। सौ-डेढ़ सौ साल बाद यदि कोई नौजवान शोधार्थी संसदीय कार्यवाही पर नजर डालेगा,  तो उसे कैसा लगेगा?  उसकी कैसी धारणा बनेगी,  जब वह यह देखेगा कि 16वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित 541 सांसदों में से 186 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें से 112 तो बेहद संगीन मामलों के आरोपी थे?  जब वह पाएगा कि पिछले कुछ वर्षों में देश भर के विधानमंडलों में कामकाज से ज्यादा हंगामा हुआ।

चुनाव जिस तरह इस गरीब देश पर खर्चे का बोझ लेकर आते हैं,  वैसे ही इन सदनों की कार्यवाही पर भी करदाताओं का धन खर्च होता है। लोकसभा और राज्यसभा की एक दिन की कार्यवाही पर करीब दो करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यानी हमारे सांसदों ने अगर एक दिन काम नहीं किया,  तो इतने रुपये गए मिट्टी में। कहने की जरूरत नहीं कि इस धन का उपयोग जनता और देश के विकास के लिए हुई चर्चा पर खर्च किया जा सकता है। इस विश्लेषण का यह अर्थ न निकाला जाए कि हमारी संसदीय प्रणाली निर्थक है। जरूरत है सांसदों के ईमानदार रवैये की। दुर्भाग्य से इस समय कइयों में इसके दर्शन नहीं होते। ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ के बहाने एक बार फिर यह हकीकत उजागर हुई है।

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