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जुनून ने दिलाई कामयाबी

मैं एक छोटे शहर के मिडिल क्लास परिवार की बेटी थी। तीन भाई-बहनों के परिवार में मुझे खूब दुलार मिला, खासकर मां का। पिता वकालत करते थे और मां घर संभालती थीं। हम उत्तर प्रदेश के फरुखाबाद जिले में रहते थे। मैंने हिंदी मिडियम से पढ़ाई की। कक्षा आठ के बाद से ही मां ने मुझे पढ़ाई के साथ खाना बनाने,  कढ़ाई-बुनाई की शिक्षा देनी शुरू कर दी। वह मुझे सर्वगुण संपन्न बनाना चाहती थीं,  ताकि किसी अच्छे घर में मेरा रिश्ता हो सके। पर मुझे तो किताबों में खोए रहना ज्यादा पसंद था। शुरुआती पढ़ाई पड़ोस के स्कूल में हुई और बाद में मुझे कानपुर यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल गया। स्नातक की डिग्री मिली,  तो मानो मेरे सपनों को पंख लग गए। मैं पोस्ट-ग्रेजुएशन के बाद पीएचडी करने के सपने देख रही थी। मेरी ख्वाहिश थी कि मेरे नाम के साथ डॉ. जुड़ जाए, लोग मुझे डॉ. रेनू कहकर बुलाएं। कॉलेज में अपनी टीचर को देखकर लगता था कि एक दिन मुझे भी किसी डिग्री कॉलेज में लेक्चर देने का मौका मिल जाए।

मेरे सपनों से अनजान घर वाले मेरे लिए दूल्हा खोज रहे थे। एक दिन सुबह सोकर उठी,  तो मां ने बताया कि हमने तुम्हारा रिश्ता तय कर दिया है,  लड़का अमेरिका में है। दस दिन बाद तुम्हारी शादी है। यह सुनते ही मेरे पांव तले की जमीन खिसक गई। मैंने साफ कह दिया,  मैं शादी नहीं करूंगी। मां मुझे समझाने लगी- बेटा,  हर लड़की को शादी करनी होती है। कोई माता-पिता अपनी बेटी को हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकते। मैंने कहा- मां इतनी जल्दी क्यों है?  पहले मुझे पढ़ाई करने दो,  नौकरी करने दो,  फिर मैं शादी कर लूंगी। मम्मी अच्छी तरह जानती थीं कि मुझे क्या चाहिए। उन्होंने पापा से बात की। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि लड़का पढ़ा-लिखा है,  परिवार भी बहुत अच्छा है,  आगे चलकर ऐसा रिश्ता न मिला, तो क्या होगा? वे किसी सूरत में यह रिश्ता नहीं छोड़ना चाहते थे। आपस में चर्चा के बाद मम्मी-पापा ने लड़के वालों से बात की। उन्होंने दूल्हे के परिवार को बताया कि लड़की शादी के बाद भी पढ़ना चाहती है। वे लोग काफी पढ़े-लिखे थे और उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि लड़की आगे पढ़ना चाहती है।

उन्होंने वादा किया कि शादी के बाद मुझे पढ़ने का मौका दिया जाएगा। हम फरुखाबाद में जिस माहौल में रहते थे, उसमें शादी के बाद लड़कियों को पढ़ते नहीं देखा था। लिहाजा मेरे लिए उनके वादे पर यकीन करना मुश्किल था। पर अब मेरे पास मम्मी-पापा की बात मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था। मैंने शादी के लिए हां कह दी। शादी के बाद अमेरिका पहुंची,  तो अच्छा लगा। वाकई परिवार के लोग खुले विचारों के थे। वे मेरी पढ़ाई के लिए राजी थे,  पर मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी अंग्रेजी को सीखना। हिंदी मिडियम की लड़की के लिए किसी अमेरिकी यूनिवर्सिटी में दाखिला मिलना कठिन था। मेरे पति मेरी दिक्कत समझ रहे थे। उन्होंने कहा कि अमेरिका में पढ़ने के लिए मुझे अंग्रेजी सीखनी होगी। अब मेरे मन में अंग्रेजी सीखने का जुनून था। वैसे,  कॉलेज में मैंने अंग्रेजी व्याकरण पढ़ी थी, इसलिए अंग्रेजी समझने में कोई खास दिक्कत नहीं थी। पर सवाल था फर्राटेदार अंग्रेजी लिखने और पढ़ने का। मैं रोजाना आठ-नौ घंटे लगातार अंग्रेजी टीवी टॉक शो सुनती थी। टीवी पर अमेरिकी अंदाज में अंग्रेजी बोल रहे लोगों की बातों को ध्यान से सुनती और उसी तरह बोलने का अभ्यास करती।

मैं अंग्रेजी अखबार रोज पढ़ने लगी। इस दौरान मुझे परिवार का भरपूर सहयोग मिला। बस कुछ महीनों में मैं अच्छी अंग्रेजी बोलने लगी। आखिरकार,  मेरा जुनून रंग लाया,  मुझे पूरडियू यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल गया। मैंने 1975 में यहां से पॉलिटिकल साइंस में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और इसके बाद इसी यूनिवर्सिटी में पीएचडी की। वर्ष 1985 में मैंने फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी से अपने करियर की शुरुआत की। फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में पहुंचकर एहसास हुआ कि वाकई सपने सच भी होते हैं। यह सपना मैंने फरुखाबाद में देखा था,  पर यह पूरा हुआ अमेरिका में। बतौर शिक्षिका बीस वर्षों का सफर काफी शानदार रहा। फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में मुझे कई अहम जिम्मेदारियां दी गईं,  जिन्हें मैंने पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश की। इस दौरान,  मैं दो बेटियों की मां बनी। यह सुखद एहसास था। मेरी बेटियां पूजा व पारुल आंखों की डॉक्टर हैं। मैंने अपनी बेटियों पर कभी अपनी उम्मीदें नहीं थोपी और उनको मनपसंद करियर चुनने की आजादी दी।

मेरे करियर का सबसे अहम पड़ाव आया 2007 में। इस साल ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर का पद खाली हुआ। पद की रेस में कई बड़े नाम थे। सब एक से बढ़कर एक काबिल थे। मैंने भी इस पद के लिए आवेदन किया था। इंटरव्यू से पहले मैं काफी नर्वस थी। पर इंटरव्यू पैनल के सामने जाने के बाद मेरा सारा डर खत्म हो गया। मुझसे ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी की रैंकिंग बढ़ाने संबंधी कई सवाल पूछे गए। मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ रैंकिंग बढ़ाने के लिए अपना प्लान प्रस्तुत किया। उन्हें मेरा प्लान पसंद आया। 15 अक्तूबर,  2007 को मुझे ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर और प्रेसिडेंट नियुक्त किया गया। यह ओहदा हासिल करने के बाद मुझे बताया गया कि ऐसा मुकाम हासिल करने वाली मैं भारतीय मूल की पहली महिला हूं। यह ऐसी कामयाबी थी,  जिसकी मैंने कभी कल्पना नहीं की थी। जैसे ही मुझे बोर्ड ऑफ गवर्नर का फैसला बताया गया,  मैंने मां को फोन किया,  जो फरुखाबाद में रहती हैं। मैं जानती थी कि उस समय भारत में रात होगी और मां सो रही होंगी,  पर मुझसे नहीं रहा गया। फोन पर मां की आवाज सुनते ही मैंने चहककर कहा, ‘मां मैं वाइस चांसलर बन गई हूं।’

भाषा आपकी तरक्की में कभी बाधा नहीं बन सकती। हां,  यह जरूर है कि अगर मैंने शुरू से अंग्रजी पढ़ी होती,  तो मुझे इतनी अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। पर सबसे अहम बात है बुनियादी शिक्षा। यदि बच्चों की नींव शुरू से मजबूत हो,  तो यह मायने नहीं रखता कि वे किस माध्यम से पढ़ रहे हैं। अमेरिका जाकर मुझे एहसास हुआ कि हमारी शिक्षा व्यवस्था बहुत मजबूत है। आज मैं जहां भी हूं,  इसका श्रेय मैं अपने देश की शिक्षा व्यवस्था को देती हूं।

प्रस्तुति:  मीना त्रिवेदी

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