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हिंदी साहित्य के खतरा रत्न

साथी! यह खतरनाक समय है। दूसरा बोला- नहीं साथी! यह बेहद खतरनाक समय है। तीसरे ने कहा कि जनाब! खतरनाक के आगे ‘सबसे ज्यादा’ विशेषण लगाना होगा,  वरना आपको साहित्य से बाहर जाना होगा,  क्योंकि खतरनाक सिर्फ खतरनाक नहीं कहा जा सकता। उसे या तो ‘बेहद’ कहना है या ‘सर्वाधिक’,  तभी आपको इस खतरनाक समय का खतरनाक लेखक माना जा सकता है। ऐसा सुनकर सभी कवि अपनी-अपनी कविता के आगे लिखने लगे भयानक खतरे की कविता,  भयानक खतरनाक की कविता,  सबसे भयानक खतरनाक खतरे की कविता! यह इसी खतरनाक का जलवा है कि आजकल हर साहित्यकार खतरनाक होने की स्पर्धा में तल्लीन रहता है। हर लेखक अपने को दूसरे से अधिक खतरनाक मानकर खतरनाक से खतरनाक लिखता है। कौन कितना खतरनाक लिखता है?  इस बात पर फाइट होती रहती है।

इस तरह हर रचना खतरनाक साहित्य की खतरनाक खबर है। खतरनाक संयोजक,  खतरनाक मंच पर खतरनाक माइक है,  खतरनाक माइक से खतरनाक ढंग से बोलता हुआ खतरनाक है कि आदरणीय खतरनाक साथियो!  इस खतरनाक समय में मैं आपके सामने कुछ खतरनाक किस्म की खतरनाकियां सादर पेश करना चाहता हूं कि- समस्या है, समस्या है,  समस्या है। यह समस्या है,  वह समस्या है। संकट है,  संकट है,  संकट है। एक से एक बढ़िया संकट है। शत्रु है, शत्रु है, शत्रु है। हर तरफ शत्रु है। हर पल खतरनाक है। हर घड़ी खतरनाक है। हर दिन खतरनाक है,  हर दौर खतरनाक है। हर युग खतरनाक है। खतरनाक न होता,  तो साहित्य न होता। साहित्य है,  तो समझो खतरा है। खतरनाक खतरे की नाक तक खतरनाक है।

साहित्य में खतरा है। खतरे की घंटी है। जिसे समीक्षक बजा रहा है। बजने से खतरा बढ़ रहा है। खतरा बढ़ रहा है, यह लिखने में खतरा है। कल जब मैं कविता लिख रहा था,  तो मुझे खतरे का आभास हुआ। एक चिड़िया फुदकती हुई आई और मुझसे खतरनाक किस्म की बात कह गई। उसके पीछे बिल्ली पड़ी थी। आज बिल्ली उसे खा गई,  कल मुझे खाएगी। श्रोताओं ने कहा- पास में एक डंडा रख यार!  इसमें खतरा क्या है?  कवि बोला कि अगर मार भगाऊंगा,  तो खतरनाक कविता कैसे लिख पाऊंगा?  खतरनाक कविता करने के लिए खतरे का जुगाड़ करना पड़ता है। तुम क्या जानो कि खतरनाक समय में खतरनाक कविता ही करनी होती है,  खतरनाक कविता करते हुए खतरनाक समीक्षा करानी है। आप मुझे करने दीजिए। कहने दीजिए कि खतरा है,  खतरनाक खतरा है। खतरा मेरी आदत है। दूसरे ने आकर खतरनाक समीक्षा की भी खतरनाक समीक्षा की। इस खतरनाक कविता की खतरनाक समीक्षा छपी,  तो पांच सौ रुपये का पेमेंट आया। समीक्षक ने कहा- थैंक्यू खतरे भाई कि तेरा नाम लेते ही पांच सौ मिले!

एक खतरनाक संगठन ने खतरनाक ढंग से खतरनाक आयोजन करते हुए खतरनाक किस्म के लेखक बुलाए। खतरनाक लेखकों के बीच खतरनाक चर्चाएं हुईं। खतरनाक लेखकों ने खतरनाक ढंग से खतरे के बारे में कहा-सुना और कविता के खतरे के बारे में खतरनाक किस्म की बातें कीं। उनकी बातें खतरे ने सुनी,  तो मुस्कराया और बोला- मैं आप सब खतरनाकों का आभार व्यक्त करना चाहता हूं,  क्योंकि मेरे इतने चाहने वाले तो एक साथ उपस्थित कभी नहीं मिले। मैं आप सबको ‘खतरा-रत्न’ दिलवाकर रहूंगा।

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  • Web Title:हिंदी साहित्य के खतरा रत्न