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गैर विशेषज्ञ बनते रहे हैं एमबीए कोर्स के निदेशक

रांची यूनिवर्सिटी के एमबीए कोर्स के निदेशक इस कोर्स के विशेषज्ञ नहीं हैं। उनके पास न ही एमबीए की डिग्री है। एसे में एमबीए की पढ़ाई कैसे चल रही है, इसका अंदाज लगाया जा सकता है। कोर्स की स्थापना से अब तक वही इसके निदेशक बनते रहे, जो पीजी कॉमर्स के एचओडी हों, या कोई वरीय प्राध्यापक। उन्हें निदेशक के कार्य के अलावा पीजी कॉमर्स में कक्षाएं लेना और विभाग को भी संभालना पड़ता है। किसी ने अब तक इस प्रोफेशनल कोर्स के लिए विशेषज्ञ, कुशल प्रशासक और जानकार निदेशक की जरूरत नहीं समझी। कोर्स के बार में कुछ खास समझ नहीं रखने के कारण शुरुआत से इसकी स्थिति गड़बड़ रही। कभी भी समय पर परीक्षाएं नहीं हो सकीं। यहां सेशन एक साल विलंब से चल रहा है। छात्र कोर्स के ढांचे से संतुष्ट नहीं हैं। पीजी कॉमर्स विभाग के एक वरीय शिक्षक भी मानते हैं कि कोई भी प्रोफेशनल कोर्स इस तरह नहीं चल सकता। विभाग को दो साल में 40 छात्रों के हिसाब से कुल 16 लाख रुपये प्राप्त होते हैं। इनमें से 32 हाार रुपये प्रतिमाह चार अनुबंधित शिक्षकों पर और कुछ खर्च गेस्ट फैकल्टी पर ही होता है। शेष राशि यूनिवर्सिटी के खाते में चली जाती है। छात्रों का कहना है कि किसी भी अनुभवी और विशेषज्ञ निदेशक के नहीं होने के कारण एमबीए की पढ़ाई में नित नये परिवर्तन को यहां निदेशक लागू नहीं कर पाते हैं।

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