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नेहरू की आस्था आध्यात्मिक थी

कुछ साल पहले सुनील खिलनाणी ने लिखा कि ‘नेहरू एक ऐसे राजनेता थे,  जो धर्म में विश्वास नहीं रखते थे,  लेकिन उनमें गहरी नैतिक दृष्टि थी। उन्होंने धर्म के आधार के बिना नैतिकता विकसित करने की कोशिश की,  जबकि उनके सामने सत्ता चलाने की मजबूरी भी थी।’  आमतौर पर यह माना जाता है कि नेहरू धर्म के प्रति संदेही थे। खिलनाणी ने अपना वह लेख 1933 में गांधी को लिखे नेहरू के एक खत से शुरू किया था-  ‘धर्म मेरे लिए बहुत परिचित इलाका नहीं है और जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ रही है,  मैं उससे दूर होता जा रहा हूं।’  फिर उन्होंने सन 1936 में प्रकाशित नेहरू की आत्मकथा से उद्धरण दिए, जहां नेहरू लिखते हैं कि संगठित धर्म से भय होता है,  जो हमेशा अंधविश्वास, प्रतिक्रियावाद,  संकीर्णता,  कट्टरता और शोषण की ओर ले जाता है। ज्यादातर सभ्यताओं और संस्कृतियों में धर्म नैतिकता का आधार रहा है।

नेहरू नैतिक व्यक्ति थे,  लेकिन उनके मूल्य धर्म पर आधारित नहीं थे। खिलनाणी के अनुसार,  नेहरू मानते थे ‘तर्क और तर्क की प्रक्रियाएं हमारे नैतिक नजरिये को बनाने और मजबूत करने के सबसे बड़े साधन हैं।’  नेहरू के बारे में यह आम धारणा ज्यादा गलत नहीं है। लेकिन यह पूरी तरह सच भी नहीं है। उनकी जिंदगी में ऐसे वक्त भी थे,  जब वह धार्मिक ग्रंथों और विचारों की ओर गहराई से आकर्षित हुए थे। ऐसा दौर तब था, जब वह सन 1921-22 में असहयोग आंदोलन के दौरान जेल में बंद थे। मुझे पिछले दिनों दो बहुत खास पत्र मिले हैं,  जो नेहरू ने गांधीजी को सन 1922 की शुरुआत में लिखे थे। नेहरू-गांधी पत्रचार का एक ताजा संकलन पिछले दिनों ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से आया है,  उनमें भी ये पत्र नहीं हैं। ये पत्र इसलिए छूट गए होंगे,  क्योंकि वे नई दिल्ली में नेहरू की दस्तावेज में नहीं,  बल्कि अहमदाबाद में गांधी की दस्तावेज में हैं।

आगरा जिला जेल से लिख गए ये दोनों पत्र हाथ से लिखे हुए हैं। पहला पत्र 9 जनवरी,  1922 का है। इसमें नेहरू बताते हैं कि वह जेल में ज्यादातर धार्मिक किताबें पढ़ रहे हैं। वह लिखते हैं कि ‘मैं ग्लोवर्स जीसस ऑफ हिस्ट्री पढ़ रहा हूं। यह किताब बहुत दिलचस्प है और इसकी रोशनी में मैंने बहुत सारा बाइबल भी पढ़ लिया। मैं तुलसीदास की रामचरितमानस भी गंभीरता से पढ़ रहा हूं। इसके अलावा,  कबीर के पद और भगवद्गीता के श्लोक मेरी सुबह-शाम की सैर के दौरान याददाश्त की कसरत के काम आ रहे हैं। मैं नियमित रूप से प्रार्थना कर रहा हूं और आपके बताए समय पर सोता हूं और तब जागता हूं,  जिसे नानक अमृत वेला कहते हैं।’

इसी पत्र में आगे नेहरू लिखते हैं,  ‘मेरे दिन आजकल संतों के बीच गुजर रहे हैं। इसके अलावा मैं बाइबल का ज्ञान भी बढ़ाते रहना चाहता हूं। रामायण,  महाभारत और भगवद्गीता मेरे साथी हैं। ..संतों के पदों और श्लोकों को याद करना बहुत ही अच्छा काम है,  इससे मैं उस दौर में पहुंच जाता हूं,  जब लोग अपने धार्मिक और दार्शनिक खजाने को अपनी याददाश्त के मजबूत किले में संजोकर रखते थे।’ दूसरा पत्र चार हफ्ते बाद 19 फरवरी को लिखा गया है। इसमें उन्होंने एक ख्वाजा साहब के बारे में लिखा है,  जो अलीगढ़ से जेल में आए थे। वह नेहरूजी को उर्दू पढ़ाते थे,  साथ ही रोज उन्हें उर्दू शायरों के कुछ शेर और कुरान की आयतें भी सुनाते थे,  जिसके बदले में नेहरू उन्हें उपनिषदों और गीता से कुछ पक्तियां सुनाते थे।

इसके अलावा,  एक अन्य कैदी रामनरेश के साथ नेहरू ने बालकांड और अयोध्याकांड पढ़ डाला था। वह कहते हैं कि बहुत सवेरे जब वह मानस पढ़ते हैं,  तो तुलसी के तरल प्रेम में जैसे घुल जाते हैं। रामायण राम के काव्यात्मक इतिहास से ज्यादा उनका आध्यात्मिक आत्म चरित्र है। जब ये पत्र लिखे गए थे,  तब नेहरू की उम्र 30 से कुछ ऊपर थी। वह कुछ दिन पहले ही गांधीजी के गहरे संपर्क में आ गए थे,  जिनकी खुद की आस्था धार्मिक तो थी,  लेकिन कुछ अलग भी थी,  क्योंकि उनके प्रेरणा स्रोत अलग-अलग थे। गांधी जिन तीन धार्मिक चिंतकों को सबसे ज्यादा याद करते हैं,  उनमें वैष्णव कवि नरसी मेहता,  जैन दार्शनिक रायचंद भाई और कुछ अलग से ईसाई लियो तॉलस्तॉय थे। हो सकता है कि गांधी के प्रभाव में नेहरू जेल में हिंदू,  मुस्लिम,  सिख और ईसाई धार्मिक परंपराओं में रम रहे हों।

इन पत्रों को लिखने के एक दशक के भीतर ही ऐसा लगता है कि नेहरू का धर्म से आकर्षण छूट गया। क्यों? असहयोग आंदोलन के दौरान हिंदू और मुसलमानों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था,  लेकिन बाद में ये समुदाय अलग-अलग हो गए और उत्तर भारत में कई हिंदू-मुस्लिम दंगे हो गए। शायद इस वजह से नेहरू को यह लगने लगा कि धर्म एक खतरनाक और विभाजनकारी शक्ति है। सन 1930 के दशक में ही नेहरू पश्चिमी समाजवाद से भी आकर्षित हुए,  जो धर्मनिरपेक्ष वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित था और एक तरह से धार्मिक आस्था के विरोध में था। भारत के विभाजन के दौरान हुए दंगों ने नेहरू की संगठित धर्म के प्रति अरुचि को बढ़ा दिया। एक ओर मुस्लिम लीग और दूसरी ओर कट्टर हिंदू संगठनों की गतिविधियों ने उन्हें यकीन दिला दिया कि सांप्रदायिक पहचान देश की एकता के खिलाफ है।

सन 1940 और 50 के दशक में नेहरू भारतीय नागरिकों में वैज्ञानिक समझ पैदा करना चाहते थे। वह मानते थे कि देश के निर्माण में धर्म की कोई जगह नहीं है। भारत को कभी ‘हिंदू पाकिस्तान नहीं बनना है।’ लेकिन जैसे-जैसे नेहरू की उम्र बढ़ी,  उन्हें लगने लगा कि धर्म को राजनीति से दूर तो रहना चाहिए,  लेकिन एक व्यक्ति की सत्य और शांति की खोज में धार्मिक आस्था की भूमिका होती है। अपने अंतिम वर्षों में नेहरू देहरादून आते थे। उन्हें हिमालय के दृश्यों से प्रेम था और वह कनखल में रहने वाली आनंदमयी मां से भी अक्सर मिला करते थे। आनंदमयी मां बंगाली हिंदू थीं,  लेकिन उनकी धार्मिक दृष्टि उदार थी और मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियों से भी उनकी बातचीत होती थी। आनंदमयी मां से नेहरू की मुलाकातें लोगों से गुप्त रखी जाती थीं,  लेकिन यह आम जानकारी थी कि वह आनंदमयी मां के संपर्क में थे।

युवावस्था में वह संतों के बारे में पढ़ रहे थे,  बुढ़ापे में एक संत से संवाद कर रहे थे। लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि नेहरू किसी धार्मिक अधिपति से नहीं,  बल्कि अलग-थलग रहने वाली एक संत से बात करते थे। इन तथ्यों से नेहरू और धर्म के रिश्ते के बारे में हमारी समझ में थोड़ी जटिलता आती है। वह ऐसे कट्टर नास्तिक नहीं थे,  जैसे उनके कई प्रशंसक और आलोचक मानते हैं। अपनी युवावस्था में नेहरू गीता,  रामचरितमानस और कुछ ईसाई धर्मग्रंथों से प्रभावित रहे,  उसके बाद वह घोर तर्कवादी हो गए,  लेकिन अपने अंतिम दिनों में वह फिर धर्म की तरफ शांति की खोज में मुड़ गए थे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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