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जनसंख्या नियंत्रण की शिकार महिलाएं ही क्यों

छत्तीसगढ़ के गांव पेंडारी में लगे सरकारी नसबंदी शिविर में बरती गई चिकित्सा संबंधी लापरवाही के चलते करीब 15 महिलाओं की मौत वाली खबर ने एक बार फिर इसकी पुष्टि की है कि ऐसे सरकारी शिविरों में मरीजों की जान जोखिम में रहती है। ऐसे मौकों पर सरकारी प्रतिक्रिया मुआवजे की रकम या जांच कमेटी तक सिमटकर रह जाती है। इन सब में सबक सीखने की मंशा कम ही दिखती है। समस्या एक निश्चित तारीख तक निश्चित संख्या में लोगों की नसबंदी का लक्ष्य भी है,  जिसके चलते पूरा महकमा नियम-कायदों को ताक पर रखकर लक्ष्य पूरा करने में जुट जाता है। यह तरीका हमें उस आपातकाल की याद  दिलाता है,  जिसका विरोध करने वाले आज छत्तीसगढ़ और केंद्र,  दोनों जगह सरकार की बागडोर थामे हुए हैं। इस तरह की कोशिशों का एक पहलू यह भी है कि अपने मुल्क में आबादी पर नियंत्रण पाने के लिए सरकार महिलाओं को ही निशाना बनाती है। आंकड़े तो यही बताते हैं। 2013-14 देश में 42 लाख नसबंदियां की गईं,  इनमें से 98 प्रतिशत औरतें थीं,  इनमें पुरुषों की संख्या महज दो प्रतिशत ही थी। इसी तरह, 2010-11 व 2011-12 में स्त्री-पुरुष वाला यह अनुपात 96 और चार प्रतिशत का था।

अगले साल 2012-13 व 2013-14 में ऐसी औरतों का आंकड़ा 97 और 98 तक पहुंच गया। यानी महिलाओं पर ही  पूरा बोझ डाल दिया गया है और इस तरह सरकार भी उस सामाजिक अवधारणा को तोड़ने में कोशिश करती दिखाई नहीं देती,  जो यह मानती आई है कि पुरुष की नसबंदी का मतलब उसकी मर्दानगी का खत्म होना है। जनसंख्या विस्फोट की राजनीति में महिलाएं समाज व सरकार के निशाने पर हैं। खासतौर पर गरीब,  अनपढ़ महिलाओं को नसबंदी के बदले चंद रुपये देने वाली सरकारी नीतियां कठघरे में हैं और सवाल यह है कि मौत के लिए बदनाम ये सरकारी शिविर आखिर कब तक अपना कहर बरसाते रहेंगे?  स्वास्थ्य सेवाओं की क्रूर असमानता भी इन गरीब परिवारों को अपने घरों की महिलाओं को मौत के साये वाले शिविरों में भेजने को मजबूर करती होगी। लिहाजा ऐसे हालात में सरकारी तंत्र को अधिक सावधानी के साथ अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना चाहिए, पर अक्सर ऐसा होता नहीं है। सरकार के लिए गरीब औरत की जान ज्यादा महत्व नहीं रखती। उसे आबादी पर काबू रखकर देश का चेहरा बदलना है।

इसके लिए औरतों को लुभाते व हांकते हुए ऐसे शिविरों तक पहुंचाने वाले हेल्थ वर्कर्स की फौज तैयार कर ली जाती है। पेंडारी गांव के नसबंदी शिविर में लाई गई नेम बाई ने कुछ दिन पहले ही एक बच्चे को जन्म दिया था और उसे हेल्थ वर्कर्स जबरन नसबंदी के लिए ले आए। सर्जरी के दो दिन बाद ही उसकी मौत हो गई। ऐसे कई नाम कुछ दिनों के लिए खबरों में हैं। यह तय है कि जल्द ही उन्हें सब भूल जाएंगे।
 (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:जनसंख्या नियंत्रण की शिकार महिलाएं ही क्यों