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हुज्जत में इज्जत के ईजारबंद

आदाब,  हुजूर आदाब। बार-बार आदाब-आदाब कहते रहने से हमारे लखनऊ के शोहदे छिछोरे वाकई गला दाब देते हैं। हम तो पैदाइशी फेंकू हैं उस्ताद। लंतरानियों की गोद में पले हैं। हवा फेंकना हमारा काम। हमारी बीवी का कहना है कि सोते समय अगर आंख का चश्मा उतारकर मेज पर रख दिया जाए,  तो चश्मा फालतू खर्च नहीं होता। वह इतनी किफायतदार है कि अक्सर रोटी का खर्च बचाकर हमें साबुत गेहूं खिला देती है। मेरे एक मित्र हैं। हैं तो आलोचक, मगर साहित्य में उनकी रुचि नहीं है। उन्होंने सुझाया कि उर्दू में लिखो। वहां हिंदी कवियों जैसा लतियाव नहीं है। सो, हम तो ठहरे कन्नेबाज। सब जगह सूत लिया,  सो पाया कि हिंदी के कुछ कविता संग्रहों के नाम बड़े हैरतअंगेज हैं। कविताएं पढ़ीं,  तो पहले हैरत हुई,  फिर हरारत। बहरहाल काव्य संग्रहों के कुछ नाम थे- जलतरंगों के कठगुलाब, अटरिया पे टंगा काला कोट, लोहे के चनों के चंपाघाट,  खुदाई में कबूतरी आदि। मित्र ने कहा- अगर तुम इनका मतलब न समझ पाए,  तो हिंदी के तरक्कीपसंदों में शामिल नहीं हो सकते।

इसलिए बेटा,  उर्दू में लिखो- गजल संग्रह का नाम रखो- हुज्जत में इज्जत के ईजारबंद। मेरे संग्रह के छपने क्या, लिखने से पहले ही उन्होंने उसकी समीक्षा और आलोचना,  दोनों लिख दी। उनकी समीक्षा के कुछ अंश- कविता में ईजारबंद होते हैं,  यही इस कवि की अंतर्दृष्टि के साथ जादुई यथार्थ की दुर्लभ संगति और अनुपम अनुप्रास छटा की उद्दात्तता का आधुनिक वैभव है। मुझे लगा कि यह भाषा केदारनाथ सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान करते राष्ट्रपति की भाषा है। बहरहाल, हिंदी हो या उर्दू,  शब्दों या लफ्जों की चमकदार पॉलिश में जो बानगी दिखती है, वह कवि या शायर की नहीं होती। आलोचक मित्र की होती है। जो गजलें मैंने नहीं लिखी हैं,  मेरे मित्र के अनुसार उन्हें पढ़कर चचा गालिब को कब्र में बेचैनी होगी। मीर मियां फकीर हो जाएंगे। जोश,  जहां भी होंगे,  उछाल खाकर मलीहाबादी हो जाएंगे। फैज तो गए काम से। यह सोचकर कि इससे मैं इतिहास का नुकसान करूंगा,  मैंने ईजारबंद कस लिया और गजल छोड़ वह लिखने लगा,  जो आप झेल रहे हैं।

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  • Web Title:हुज्जत में इज्जत के ईजारबंद