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अनजानी जमीन पर छलांग

दो दिन से वह उलझे हुए हैं। क्या करें उस पेशकश का? वह कुछ भी तय नहीं कर पा रहे। अपने काम में मन नहीं लग रहा उनका। कभी-कभी फैसले लेना कितना मुश्किल होता है?  दरअसल, ‘हम भविष्य में छलांग लगाना चाहते हैं, लेकिन हमारे पास जो है, उसे खोने से डरते हैं।’  यह मानना है डॉ. डेविड ब्रॉचर का। वह ‘द विलियम एलनसन व्हाइट इंस्टीट्यूट’ से जुड़े हुए हैं। ब्रॉचर मनोविज्ञान की मशहूर पत्रिका साइकोएनेलिसिस के संपादक हैं। जिंदगी और जोखिम का अजब रिश्ता है। हमें जिंदगी जीने के लिए कुछ फैसले लेने पड़ते हैं। कभी हो सकता है कि उन फैसलों का किसी जोखिम से लेना-देना न हो। लेकिन कभी सचमुच कोई फैसला बड़े जोखिम वाला हो सकता है। उन्हीं मौकों पर हम चकरा जाते हैं। असल में, छलांग तो हमें आने वाले कल में लगानी होती है। हम जब छलांग लगाते हैं,  तो अपनी जमीन से हटना ही पड़ता है। हम एक जगह टिके होते हैं। एक मायने में रुके हुए होते हैं। हम जब अपने रुकने को महसूस करते हैं,  तो वहां से हिलना चाहते हैं।

अब हिलने के लिए हमें कुछ जुगत तो करनी पड़ेगी न। आमतौर पर हम इस तरह हिलना चाहते हैं कि उस रुकावट को पार कर जाएं। लेकिन उसमें कोई खास दिक्कत न आए। हमें कम से कम उस जमीन का पूरा भरोसा हो,  जिस पर हमारे कदम पड़ने वाले हैं। कभी-कभी जिंदगी हमें बड़ी छलांग लगाने का मौका देती है। यह छलांग एक मायने में अनजानी जमीन पर होती है। हम एक जगह से छलांग लगाते हैं और नहीं जानते कि सही जगह ‘लैंड’ करेंगे या नहीं। वह जमीन हमारे लिए कैसी होगी?  बस यहीं पर हम अटक जाते हैं। हमें अपने पर जितना भरोसा होता है,  उतना ही हम जोखिम ले पाते हैं। हमें अपने उसी भरोसे पर काम करना चाहिए, बाकी सब अपने आप सध जाता है।

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