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अमेरिका-चीन समझौते

21वीं सदी में कौन वैश्विक मूल्यों को आकार देगा? एक उत्तर बीजिंग में इस हफ्ते हुई शिखर बैठक में चीन और जापान के बीच हुए असाधारण समझौते में छिपा हुआ है। ये दो बड़े देश अपने-अपने हितों को लेकर टकराते रहे हैं और अब ये कार्बन उत्सजर्न, आकाश और हवा में सैन्य बर्ताव सुधारने, कारोबार के अधिक रास्ते खोलने और दस वर्षों तक मान्य नरम वीजा नीति के मसले पर एक साझा दृष्टिकोण बनाने में सफल हुए हैं। हर समझौता अपने आप में विशेष प्रगति को दर्शाता है, खास तौर पर पर्यावरण,  शांति,  समृद्धि और लोगों की आवाजाही के क्षेत्र में। इन सबको एक साथ रखें, तो ये दरअसल समान सिद्धांतों पर आधारित हैं और सब पर लागू होते हैं। ये समझौते चीन के उस दावे की जांच करते हैं, जिसमें यह है कि ‘सार्वभौमिक मूल्य’ कुछ भी नहीं होता, बल्कि अपनी-अपनी संस्कृति और सियासत के आधार पर देशों के हित एक-दूसरे से परस्पर जुड़ते हैं।

चीन की नजर में देशों के संबंध शक्ति-वितरण द्वारा निर्धारित होते हैं, न कि साझे मूल्य से। ओबामा और शी जिनपिंग की बैठक से पहले अमेरिकी अधिकारियों ने समान मूल्यों पर चीन के साथ समझौते से जुड़ी दिक्कतों के बारे में आगाह किया था। शी जिनपिंग ‘चीन के स्वप्न’ को प्रश्रय देना पसंद करते रहे हैं। हालांकि, कई बार वह ‘एशिया-पैसिफिक स्वप्न’ को भी बढ़ावा देते दिखाई पड़े हैं। पर उन्होंने ‘ग्लोबल ड्रीम’ की कभी चर्चा नहीं की। एक आंतरिक दस्तावेज लीक हुई,  जिसमें चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने सरकारी प्रेस को यह चेतावनी दी है कि वह सार्वभौमिक मूल्यों का जिक्र न करे,  जैसे कि लोकतांत्रिक अधिकारों पर कोई बात न हो। ऐसे मूल्य पश्चिम से जुड़े हुए हैं,  खास तौर से अमेरिका से। सार्वभौमिक मूल्यों के तथ्य चीन की सुरक्षा चिंताओं के कारण अलग-थलग पड़ जाते हैं। शंघाई एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेस के चीनी विद्वान वांग चेनगजाई ने लिखा है कि पश्चिम प्रचारित मूल्य लंबे समय में विविध मूल्यों को रास्ता दिखाएंगे,  क्योंकि ब्राजील, चीन व भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं उत्थान की ओर हैं। इसलिए सार्वभौमिक मूल्यों को अपनाने से वैश्विक मूल्य आकार लेंगे।   
द क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर,  अमेरिका

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