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गठबंधन सरकार की आदत सी पड़ गई है

प्रदेश की जनता को गठबंधन की सरकार की आदत सी पड़ गई है। जब से राज्य बना और जितने भी चुनाव हुए, किसी भी एक दल को बहुमत नहीं मिला। इसका प्रमुख कारण राज्य की भौगोलिक बनावट और वहां का परिवेश भी रहा। राज्य की इस बनावट के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व रहा।

संताल परगना की बात करें तो वहां भी एक विशेष दल का वर्चस्व है। कोडरमा, चतरा और पलामू में जातीय समीकरण एक बडम कारण है, जो चुनाव परिणामों पर पूरा असर डालता है। इन क्षेत्रों में बिहार के क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व है। कोल्हान में भी क्षेत्रीय दलों के अलावा निर्दलीय भी अपना प्रभाव छोड़ते हैं। जहां तक शहरी क्षेत्रों जमशेदपुर, धनबाद, रांची और बोकारो की बात है, तो इन जिलों में राष्ट्रीय दलों का असर दिखता है। कुल मिलाकर ये सभी क्षेत्र होमोजेनस एरिया नहीं हैं। यही कारण है कि झारखंड गठन के बाद से अब तक स्थायी सरकार नहीं बनी और सरकारें बदलती रहीं।

बार्गेनिंग के कारण डिलिवरी पर फोकस नहीं
अब तक जितनी भी सरकारें बनीं, किसी ने डिलिवरी पर फोकस नहीं किया। अगर किसी ने करना भी चाहा, तो गठबंधन की सरकार के कारण सहयोगी दलों ने दबाव बनाकर काम आगे नहीं बढ़ने दिया। अब तक बनी सभी सरकारों में बार्गेनिंग के सिवा कुछ भी नहीं हुआ। एक समय था, जब एक दल ने 34 से 35 का आंकड़ा छुआ था। इस दल का भी बार्गेनिंग के कारण प्रभाव कम होता चला गया। इन सब घटनाओं को लेकर जनता के बीच ऊहापोह की स्थिति बनी रहती है।

माइनिंग एरिया के कारण भी उथल-पुथल
राज्य में सरकार बनने और बिगड़ने का खेल में माइनिंग एरिया भी भूमिका काफी रही है। खनन क्षेत्र में राजनीतिक दल टकटकी लगाए रखते हैं। इस क्षेत्र में रुपए-पैसे की इतनी संभावनाएं हैं कि हर दल इस क्षेत्र पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना चाहता है। इस धन के कारण कई बार सरकार में उथल-पुथल भी मचा। सरकार कई बार अस्थिर भी हुई। इसके कई उदाहरण लोगों के सामने हैं।

नीतिगत मामले भी बने अस्थिरता का कारण
अब तक जितनी भी सरकारें बनीं, सभी नीतिगत मामले पर उलझे रहे। किसी भी नीतिगत मामले पर निर्णय नहीं हो पाया। राज्य गठन के बाद से ही स्थानीयता का मुद्दा सुलग रहा है। इसकी आंच अब तक धीमी नहीं हुई है। इस मुद्दे के कारण कई बार सरकार संकट में आई। एक सरकार को इस मुद्दे पर सत्ता से हटना भी पड़ा। कमोबेश सभी दलों ने इसे अपने घोषणा पत्र में प्राथमिकता दी। पर किसी भी दल ने इस समस्या के निदान के लिए पहल नहीं की।
(लेखक पूर्व आइएएस अधिकारी हैं)

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