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बंबई उच्च न्यायालय ने मराठा, मुस्लिमों के लिए आरक्षण पर रोक लगाई

बंबई उच्च न्यायालय ने मराठा, मुस्लिमों के लिए आरक्षण पर रोक लगाई

बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र की पूर्ववर्ती कांग्रेस (राकांपा) सरकार के उस विवादास्पद निर्णय पर रोक लगा दी जिसमें राज्य विधानसभा चुनावों से पहले सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मराठों के लिए आरक्षण की व्यवस्था थी।
      
न्यायालय ने सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों को पांच फीसदी आरक्षण देने के निर्णय पर भी रोक लगा दी लेकिन इस वर्ग के लिये शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की अनुमति दे दी। मुख्य न्यायाधीश मोहित शाह की अध्यक्षता वाली पीठ ने इन फैसलों के खिलाफ दायर अनेक याचिकाओं को विचारार्थ स्वीकार करते हुये कहा कि आरक्षण के लिए उच्चतम न्यायालय ने कानून बना रखा है जिसमें कुल सीटों के 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता ।
      
सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में पहले से ही 52 फीसदी सीटें आरक्षित हैं और कांग्रेस-राकांपा सरकार ने विधानसभा चुनावों के दौरान इसे बढ़ाकर 73 फीसदी कर दिया। सरकार ने मराठों के लिए 16 फीसदी और मुस्लिमों के लिये पांच फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी।
      
अदालत का मानना था कि सरकार की तरफ से मुहैया कराए गए तुलनात्मक आंकड़ों के कारण सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में मुस्लिमों के लिए आरक्षण शुरू किया गया। बहरहाल इसने निजी शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण के दायरे से अलग रखा ।
      
सरकार ने मराठों और मुस्लिमों के लिए आरक्षण के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि दोनों समुदाय सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं और आर्थिक रूप से गरीब हैं। कहा जाता है कि यह निर्णय पूर्व मंत्री नारायण राणे की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट पर आधारित था जिसका गठन इस मुददे पर गौर करने के लिए किया गया था।

सरकार ने कहा कि उसने राजेन्द्र सच्चर समिति और महमूदुर रहमान समिति की अनुशंसाओं पर भी गौर किया । दोनों में मुस्लिमों के लिए आरक्षण की अनुशंसा की गई थी। दोनों समुदायों के आरक्षण को सामाजिक कार्यकर्ता केतन तिरोडकर, गैर सरकारी संगठन यूथ फॉर इक्वालिटी, अनिल थानेकर, इंडियन हेल्थ आर्गेनाइजेशन के आई़ एस़ गिलाडा और अन्य ने जनहित याचिकाओं के माध्यम से चुनौती दी थी।

यूथ फॉर इक्वैलिटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती ने आरक्षण पर उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों का जिक्र किया जिसमें कहा गया है कि यह कुल सीट के 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर भी आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
      
संचेती ने कहा कि राज्य सरकार ने मुस्लिमों और मराठाओं के साथ ही अन्य समुदायों की जनसंख्या एवं पिछड़ेपन को लेकर तुलनात्मक आंकड़ा मुहैया नहीं कराया है। उन्होंने विधानसभा चुनावों को देखते हुए जल्दबाजी में आरक्षण लागू करने के राज्य सरकार के निर्णय पर भी सवाल खड़े किए।
      
तिरोडकर और अन्य याचिकाकर्ताओं ने आरक्षण का विरोध करते हुए कहा कि मराठा और मुस्लिम पिछड़े हुए समुदाय नहीं हैं। तिरोडकर ने कहा कि 75 फीसदी सहकारी चीनी फैक्टरी और इतनी ही संख्या में महाराष्ट्र में शैक्षणिक संस्थान मराठाओं के नियंत्रण में हैं। साथ ही वे राज्य में करीब 75 फीसदी भूमि के मालिक हैं।
      
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के वर्ष 2000 की एक रिपोर्ट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मराठा सामाजिक रूप से उन्नत हैं और इस प्रकार उन्हें पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि आयोग ने पिछड़े वर्ग की श्रेणी की सूची में मराठों को शामिल करने के दावे को खारिज करते हुए कहा था कि आधुनिक महाराष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास को रूप देने में मराठों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राज्य के विकास में कई क्षेत्रों में वह अग्रणी भूमिका में रहे।

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  • Web Title:बंबई उच्च न्यायालय ने मराठा, मुस्लिमों के लिए आरक्षण पर रोक लगाई