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अमरोहा चीनी मिल का पहिया कब घूमेगा

ईश्वर करें, कभी ऐसा न हो। अब वेव ग्रुप की अमरोहा चीनी मिल का पहिया कभी नहीं घूमाएगा! मशीनरी के पुर्जे बूढ़े होने जैसे तर्को के संग ग्रुप ने तीन साल पूर्व बंदकर ताले ही नहीं ठोंके, बल्कि वर्तमान स्थिति से भविष्य में संचालन की उम्मीद भी नजर नहीं आ रही। दुर्भाग्य ये है कि मूल समस्या का समाधान खोजने के बदले अफसर भी संबंधित किसानों को गैर मिलों से जोड़कर चुप्पी साधे बैठे हैं। कभी कभार किसान नेता जरूर पुन: संचालन की मांगकर किसानों के जख्म पर मरहम लगाने का काम कर देते हैं। कुंदन सेठ ने 1970 के दशक में जिले में सबसे पहले अमरोहा की चीनी मिल की नींव रखी थी। घाटा होने पर मिल को निगम ने संचालित किया, लेकिन वह लंबी पारी नहीं खेल सकी व नुकसान में जाने पर बसपा सरकार में वेव ग्रुप ने इस मिल को करीब चार साल पहले खरीद लिया।


ग्रुप ने वर्ष 2010 में केवल एक पेराई सत्र पूरा किया व दूसरे सत्र में नौ दिन की पेराई के बाद मिल बंदकर दी। इस पर करीब 55 हजार किसान भड़क उठे। बेमियादी धरने, प्रदर्शन, हाइवे जाम से लेकर लखनऊ में सीएम दरबार तक किसान नेताओं ने दस्तक दी। मामला सुर्खियां बना तो अफसरों ने सुर में सुर मिलाया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।


प्रबंधन ने मामला शांत करने को जल्द संचालन की ताल ठोक दी, लेकिन आज तक पेराई शुरू नहीं की। वर्तमान में पुन: मिल संचालन का मुद्दा पूरी तरह से बोतल में बंद हो चुका है। मिल में ताले लटके हैं। न अफसरों की जुबां पर संचालन का जिक्र ही आता है और न किसान नेताओं में संजीदगी ही बची है। इन परिस्थितियों में अमरोहा मिल की चिमनियों से कभी धुआं उठेगा भी या नहीं, कहना मुश्किल है।
 
वेव ग्रुप का रवैया व सरकारी अमले की चुप्पी से साफ है, अमरोहा मिल का संचालन नहीं होगा। वस्तुस्थिति से सीएम व गन्ना आयुक्त पूरी तरह वाकिफ हैं, लेकिन मिल संचालन के नाम पर किसानों का दर्द किसी ने बांटने की कोशिश नहीं की। संगठन इसे मुद्दे को लेकर कोर्ट की शरण लेने के पहलु पर विचार कर रहा है।
 चौ.दिवाकर सिंह, भाकियू भानू

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