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नेहरू की विरासत

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की यह 125वीं जयंती है। पिछले काफी वक्त से नेहरू की तीखी आलोचना का दौर चल रहा है। आर्थिक उदारीकरण के बाद नेहरू की आलोचना इसलिए शुरू हुई कि उन्हें देश में सरकारी नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था को स्थापित करने का दोषी माना गया। नेहरू अत्यंत उदार लोकतांत्रिक नजरिये के व्यक्ति थे, लेकिन उनका राजनीतिक रुझान थोड़ा-सा वामपंथी था। हिंदुत्ववादी तो नेहरू को देश की सभी समस्याओं का जिम्मेदार मानते हैं, हालांकि उनका वास्तविक गुस्सा नेहरू की अडिग धर्मनिरपेक्षता पर है। इस साल दिल्ली में पहली बार ऐसी सरकार बनी है, जिसका नेहरू और उनके विचार से कोई भावनात्मक और वैचारिक रिश्ता नहीं है। राजग सरकार पहले भी देश में छह साल राज कर चुकी है, उसके मुखिया अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनसंघ के संस्थापक होते हुए भी नेहरू के प्रशंसक थे। कहा यह जाता था कि बतौर प्रधानमंत्री वाजपेयी, नेहरू का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे थे।

नेहरू बहुत उथल-पुथल वाले दौर में देश के अग्रणी नेताओं में से थे और शायद उनसे कई गलतियां भी हुई हों। लेकिन उन्होंने देश को जो कुछ दिया, उसके मुकाबले उनकी बड़ी से बड़ी गलती भी छोटी हो जाती है। नेहरू के योगदान के महत्व और विराटता को समझना हो, तो हमें उसी वक्त स्वतंत्र हुए दूसरे देशों के मुकाबले अपने देश को रखकर देखना चाहिए। शायद ही किसी देश में आजादी के बाद से ही ऐसा स्थायी लोकतंत्र और स्थिर सांविधानिक व्यवस्था रही हो। सभी अलग-अलग किस्म की तानाशाही और हिंसक विद्रोहों से उलझते रहे हैं। नेहरू जब प्रधानमंत्री बने, तब देश का धर्म के आधार पर विभाजन हो चुका था, तभी देश के सबसे बड़े नेता महात्मा गांधी की हत्या हो गई। ऐसे में, एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को स्थापित करने के लिए जबर्दस्त साहस, नैतिक दृढ़ता और उदारता की जरूरत थी। भीमराव अंबेडकर से लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे अलग-अलग विचारों के बड़े लोगों को साथ लेकर संविधान सभा बनाने और गंभीर विमर्श के बाद संविधान बनाकर उसे लागू करवाने में नेहरू की भूमिका बहुत बड़ी थी। जब विकसित देशों तक में सभी वयस्कों को मताधिकार नहीं मिला था, तब भारत में बिना जाति, धर्म, वर्ग, शिक्षा का ख्याल किए वयस्क मताधिकार की योजना बहुत बड़ा साहस था। पहले आम चुनावों से लेकर 1967 के आम चुनावों तक विदेशी आलोचक भविष्यवाणी करते रहे कि यह भारत के आखिरी आम चुनाव हैं, इसके बाद तानाशाही आ जाएगी। लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू ने लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर नहीं होने दिया।

लोकतंत्र के अलावा धर्म और राज्य को अलग रखना नेहरू की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने उदारता दिखाते हुए देश में तमाम अलगाववादी आंदोलनों को शांत करके लगभग सभी शक्तियों को लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल किया। नेहरू का एक और बड़ा योगदान देश में उन तमाम संस्थाओं की स्थापना है, जो भारत की व्यवस्था का आधार हैं। चाहे कला-संस्कृति, साहित्य की अकादमियां हों या आईआईटी जैसे उच्च शिक्षा के केंद्र, उनके पीछे नेहरू की दूरदृष्टि थी। नेहरू ने लोकतांत्रिक संस्थानों को बनाने के अलावा उनकी परंपराएं व मर्यादाएं स्थापित करने की भी कोशिश की। वह संसद में उपस्थिति अपना कर्तव्य मानते थे और विपक्षी सांसदों के भाषण भी ध्यान से सुनते थे। विरोधियों को जितना सम्मान नेहरू ने दिया, वह दुर्लभ है। जिन संस्थानों के आधार पर हम विश्व शक्ति बनने की उम्मीद करते हैं, उनकी स्थापना में सबसे बड़ा योगदान नेहरू का है।

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