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बचपन को बुराई से मुक्त करें

भारत के बच्चे 14 नवंबर को अपने दिवस के रूप में वर्षों से मनाते आ रहे हैं। यह साल इस मायने में थोड़ा अलग है कि वे इसे नोबेल शांति पुरस्कार के उपहार के साथ मनाएंगे। यकीनन, यह बच्चों की आवाजों और उनके चेहरों को सम्मान है, जो आवाजें अरसे से मंद पड़ी थीं और जो चेहरे वर्षों से समाज को दिखाई नहीं दे रहे थे। इसलिए मैंने इस नोबेल शांति पुरस्कार को दुनिया के बच्चों को समर्पित किया है। मैं हमेशा यह महसूस करता हूं कि उन्हीं में से मैं एक हूं। मैंने बचपन को कभी उम्र से निर्धारित नहीं किया है। मेरे मुताबिक, यह वह मूल्य है, जिसे पूरी उम्र के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। इस तरह के सद्गुणों से जिंदगी ज्यादा सरल बन जाती है और दुनिया पहले से कहीं अधिक खूबसूरत और महफूज नजर आने लगती है।

आज हम कई गंभीर समस्याओं, संकटों और अनैतिक आचरणों से जूझ रहे हैं, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि बचपन को कुचल देना हमारे दौर का सबसे बड़ा अनैतिक आचरण है। मैं दृढ़ता से यह अनुभव करता आया हूं कि दुनिया उन चार ‘आर’ को हासिल कर सकती है, जिसे पर मेरा गहरा विश्वास है। पहला ‘आर’ है- रिमेम्बिरग अवर ओन चाइल्डहुड (अपने बचपन को याद करना)। इसके बाद है- मौजूदा समय की दासता और बाल-शोषण के मुद्दे को रिकॉग्नाइज करना (पहचानना), घोर निराशा से अभूतपूर्व आशा की उनकी यात्रा को ‘रिस्पेक्ट’ (सम्मान) देना। आखिरी और चौथा ‘आर’ है- चेतना, जागरूकता बढ़ाकर उनके बचपन को रिस्टोर (बहाल) करना। ये सब जरूरी हैं और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सबके अपने बेटे-बेटियां हैं, पोते-पोतियां हैं, भाई-बहनें हैं और हमारे दोस्तों के भी  बच्चे हैं।

यहां तक कि हममें से हर किसी को अपनी पूरी जिंदगी में एक बार बच्चा बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है। इस बात को अपने जेहन में सहेजने का मतलब है कि सुरक्षा, प्रेम, आनंद, आजादी और शिक्षा की जरूरत को महसूस करना। हर बच्चे का यह अधिकार है कि वह इन चीजों को पाए। इसके अलावा, इस सौभाग्य की अनुभूति हमें सरलता और मासूमियत की सुंदरता को समझाने में भी काफी मदद करती है, जो लोगों की व्यक्तिगत और सामाजिक जिंदगी में बड़ी तेजी से घटती जा रही है। बचपन को तमाम बुरे तत्वों से मुक्त रखना न केवल इंसानियत का एक कर्म है, बल्कि आज की तुलना में अधिक सुरक्षित संसार बनाने की पहली शर्त है। आज के ज्यादातर लोग इस बात से वाकिफ नहीं होंगे, वे यही मानते होंगे कि बच्चों की गुलामी मध्यकालीन युग की घटना है। लेकिन यह प्रथा आज भी समाज में व्याप्त है और बेशर्मी के साथ जारी है।

हम यह पढ़ते आ रहे हैं कि पूरी दुनिया में 17 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी के बंधन में जकड़े हुए हैं। इनमें से 8.5 करोड़ बच्चे या तो गुलाम की तरह जिंदगी जी रहे हैं, या बाल-तस्करी के जरिये उन्हें अगवा कर उनको हाथों में हथियार थमाए जाते हैं, देह-व्यापार के धंधे में झोंका जाता है। यहां तक कि उनका इस्तेमाल क्रूर अपराधी या भिखारियों के तौर पर किया जाता है। साथ ही साथ, उनमें से कई बच्चों से वैसे खतरनाक काम लिए जाते हैं, जिनके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता।

इस तथ्य को एक बड़ी चुनौती के तौर पर हर किसी ने मान लिया है। हमें गर्व है कि हम अपने उस दौर के गवाह बन रहे हैं या उस समय का हिस्सा बन रहे हैं, जो सूचना और संचार की नई सभ्यता है। इस सभ्यता में मानवीय भावों और संवेदनाओं समेत हर चीज का डिजिटलाइजेशन हुआ है। लेकिन विडंबना यह है कि इसी दौर में हर दिन 22,000 बच्चे गरीबी-तंगहाली के कारण मरते हैं। ऐसे में, यह बड़ा सवाल उठ खड़ा होता है कि ‘इसमें गलती किसकी है?’ इसके लिए किसे दोषी ठहराया जाए? किसी को भी यह समझना चाहिए कि ये गुलाम बच्चे क्रूरता के पात्र नहीं हैं और हर बच्चा समान ईश्वरीय कृपा तथा सांविधानिक व कानूनी अधिकार के साथ जन्म लेता है। आजादी और शिक्षा का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण मूलभूत अधिकार है और इससे किसी भी शर्त पर समझौता नहीं किया जाना चाहिए। मैं चैरिटी के तौर पर काम करने में यकीन नहीं करता। मैं यही करने की कोशिश करता हूं कि बच्चों के अधिकारों की हिफाजत करूं, जो निहित हितों द्वारा लूटे जा रहे हैं। स्वतंत्रता परमात्मा है और दासता मानव का अनुमान और डिजाइन है। इसलिए, यह कभी नश्वर नहीं रह सकती। अंत में, स्वतंत्रता ही जीतेगी। इसलिए हम सबको मिलकर बच्चों के लिए एक मैत्रीपूर्ण संसार विकसित करना चाहिए, जहां बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार हो और उनके लिए सम्मान ही जिंदगी जीने का रास्ता हो। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमें अपने व्यक्तिगत, राजनीतिक और सामाजिक जीवन में बचपन को शीर्ष प्राथमिकता देनी चाहिए। हर बच्चा शोषण और मजदूरी से मुक्त होना चाहिए, क्योंकि ये उन्हें शिक्षा और भविष्य के अवसर से वंचित कर देते हैं। इससे वयस्क बेरोजगारी और गरीबी के साथ एक दुष्चक्र का निर्माण होता है।

इस दर्दनाक विरोधाभास की तरफ देखिए कि जहां 17 करोड़ बच्चों के पास पूरे समय के रोजगार हैं, वहीं करीब 20 करोड़ वयस्क बेरोजगार हैं। ये वयस्क कोई और नहीं, बल्कि बाल मजदूरों के माता-पिता ही हैं।

जाहिर है कि किसी को यह चक्र तोड़ना ही होगा, और यह विरोधाभास बाल मजदूरी के खत्म होने से ही समाप्त हो पाएगा। यह काम असंभव तो नहीं है। मैं हमेशा से ही यह कहता रहा हूं कि भारत सौ समस्याओं का एक देश हो सकता है, लेकिन यह हजारों समाधानों की मातृभूमि भी है। सामूहिक कार्यों, राजनीतिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त संसाधनों और वंचित बच्चों के प्रति पर्याप्त सहानुभूति से बाल-मजदूरी समाप्त की जा सकती है और यह समाप्त होगी। बाल-मजूदरी शिक्षा के अधिकार को नकारना या उसका उल्लंघन है, इसलिए यह बच्चों के विरुद्ध हिंसा भी है। भारत के पास अपनी बड़ी से बड़ी समस्याओं से निपटने का सर्वाधिक अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीका मौजूद है और यह उसकी परंपराओं में ही निहित है। ऐसे में, हमें बच्चों के लिए एक मैत्रीपूर्ण वातावरण तैयार करने के लिए काम करना चाहिए और इस मामले में युवाओं की अदम्य शक्ति को महसूस किया जाना चाहिए। इस महत्वपूर्ण अवसर पर मैं आप सभी को एक नारा देकर आह्वान  करता हूं- ‘आइए, सहानुभूति का वैश्वीकरण, सूचना का लोकतंत्रीकरण और अधिकारों का सर्वव्यापीकरण करें।’
      (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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