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बच्चों की किताबें और बड़ों की सोच

बाल साहित्य पर चर्चा का मौसम फिर आ गया। आज चाचा नेहरू का जन्मदिन व बाल दिवस है, अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस भी 20 नवंबर को होगा। इन दिनों बच्चों की समस्याओं और बाल साहित्य पर रस्मी बातचीत होती है। कई बड़े साहित्यकार, जिन्होंने बच्चों के लिए शायद ही कभी कुछ लिखा है, वे विचार प्रकट करते हैं कि हिंदी में तो बाल साहित्य है ही नहीं, और जो भी है, वह कूड़ा है। हालांकि यह भी हो सकता है कि उन्हें बच्चों के बीच लोकप्रिय बड़े विदेशी लेखकों जैसे कि एनिड, ग्रिम या एंडरसन का नाम भी न पता हो। ज्यादा से ज्यादा वे हैरी पॉटर और जे के रोलिंग के नाम जानते हों। हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के बच्चों के लेखकों के बारे में कोई चर्चा ही नहीं होती है। शायद इसमें उनका दोष भी नहीं है। यदि आप पुस्तकालयों में जाएं, तो बाल साहित्य के नाम पर आपको जो पुस्तकें वहां मिलेंगी, उनमें सब कुछ होगा बच्चों की दिलचस्पी जगाने के अलावा। न्यूज प्रिंट पर छपी अनाम लेखकों की, बेहद खराब छपाई वाली उन किताबों में, जिनसे बच्चों का कुछ  लेना-देना ही नहीं होता, उनके सिर पर सिवाय नैतिक शिक्षा और यह करो और वह मत करो का बोझ लादने के। अक्सर उनमें इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि बच्चों को भी मनोरंजन चाहिए। आखिर कौन-सा बच्चा अध्यापक के हाथ में दिखाई देती छड़ी छाप पुस्तकों को पढ़ना चाहेगा?

दो वर्ष पहले भीमताल से आगे सोना-पानी में पांच दिन की एक वर्कशाप हुई थी। इस कार्यशाला में नेशनल बुक ट्रस्ट, एनसीईआरटी, कुछ  एनजीओ, बाल साहित्य प्रकाशकों, लेखकों, संपादकों वगैरह ने भाग लिया था। इसमें बच्चों के लिए अच्छी किताबों के विमर्श में दो तरह की किताबें सामने आईं। एक वे, जिनकी छपाई, कहानी, कागज सब बहुत अच्छा था, मगर जिन्हें सरकारी खरीद में जगह नहीं मिलती। इसलिए अक्सर वे बच्चों तक नहीं पहुंच पातीं, और दूसरी वे, जो गुणवत्ता की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं, पर देश भर के पुस्तकालयों में पहुंच जाती हैं। यह सिर्फ खोटे सिक्के के चल जाने भर का मामला नहीं है। उम्र के उस पड़ाव को प्रभावित करने का मामला है, जहां से कोई पीढ़ी पढ़ने की आदत बनाती है।

बच्चों के लिए हिंदी में लिखने वालों की कमी नहीं है। कमलेश्वर, मन्नू भंडारी, मनोहर श्याम जोशी, अमृतलाल नागर, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव आदि बहुत से मशहूर लेखकों ने बच्चों के लिए लिखा है।  बांग्ला, मलयालम, मराठी आदि भाषाओं में लेखक होने के लिए बच्चों के लिए लिखना जरूरी है। रवींद्रनाथ टेगौर उस लेखक को अच्छा नहीं मानते थे, जिसने कभी बच्चों के लिए न लिखा हो। लेकिन अब लेखकों की एक ऐसी पीढ़ी आ गई है, जो बच्चों के लिए लेखन को बचकाना मानती है।

एक तरफ शिकायत है कि बच्चे पढ़ते नहीं हैं, दूसरी तरफ कोशिश है कि उनके लिए लिखा ही न जाए।
     (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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