DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पक्ष-विपक्ष

पक्ष और विपक्ष की चर्चा सबसे ज्यादा राजनीतिक संदर्भ में की जाती है। दोनों एक-दूसरे की न केवल कमियां खोजते हैं, बल्कि दूसरे पर प्रहार भी करते हैं। लेकिन इन दोनों तरह की धारणाएं हमारे मन के अंदर भी हैं। एक समय पर पक्ष आता है और पलक झपकते विपक्ष भी खड़ा हो जाता है। अपने ही अंदर के अनुभवों का इतना बडा संसार है कि हमें और कहीं जाने की जरूरत नहीं, लेकिन हम हैं कि मारे-मारे फिरने लगते हैं। जब भी संकट में पड़ते हैं, तो घबराकर हल ढूंढने की बजाय किसी और के दरवाजे पर दस्तक देने लगते हैं।

विनोबा भावे ने कहा है कि ‘विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करना, उन पर आधी विजय हासिल करने जैसा है।’ इसी तरह की बात जैन विदुषी साध्वी मंजुला कहती हैं- जो खुद को साध लेता है, वह हर प्रश्न का उत्तर खुद से ही पूछ लेता है। लेकिन इसके लिए स्वयं पर भरोसा सबसे जरूरी है। साधने का संबंध आत्म-साधना से है, जो जीवन को अनुशासित और व्यवस्थित करती है। जिसके पास आत्मशक्ति होती है, उसे न तो दुख परेशान करता है और न अपमान हिला पाता है। ऐसे लोग पक्ष और विपक्ष, अच्छे और बुरे, दोनों के साक्षी बन जाते हैं। उन्हें सही और गलत का फैसला करना आ जाता है। इसके लिए मन के ज्ञान को विज्ञान से जोडम्ना जरूरी है। विज्ञान खोज की एक प्रक्रिया है, जिसे हमारा शास्त्र आत्म-मंथन कहता है। विज्ञान और शास्त्र हमेशा साक्षी रहने का भाव जगाते हैं। वे समस्या को संकट के रूप में नहीं, बल्कि समाधान के प्रस्थान बिंदु के रूप में देखते हैं। लेकिन यहां समर्थन और विरोध, दोनों का होना भी जरूरी है। तर्क जितने पक्ष में होते हैं, उससे कहीं ज्यादा विपक्ष में होते हैं। इसी से सही निष्कर्ष पर पहुंचने में कामयाबी मिलती है। लोकतंत्र की तरह ही खुद के भीतर भी पक्ष और विपक्ष का होना आवश्यक है।                  

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पक्ष-विपक्ष