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केंद्र में भी टूट सकता है शिवसेना का साथ

केंद्र में भी टूट सकता है शिवसेना का साथ

महाराष्ट्र विधानसभा में शिवसेना के विपक्ष में बैठने के बाद केंद्र में दोनों का साथ कभी भी टूट सकता है। शिवसेना के साथ छोड़ने की स्थिति में संसद में एनडीए की ताकत घटेगी।

राज्यसभा में तो एनडीए का बहुमत अभी भी नहीं है। अब शिवसेना के बिना विशेष स्थितियों में दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में भी एनडीए अल्पमत में आ जाएगा। महाराष्ट्र में उनकी नई अघोषित सहयोगी एनसीपी भी इस कमी को पूरा नहीं कर सकती है। खराब हुए रिश्तों के बावजूद भाजपा शिवसेना पर ज्यादा हमलावर नहीं है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली से पूरे हालात पर खुद नजर रखी और अपने प्रवक्ताओं को भी संभलकर बोलने की हिदायत दी। भाजपा की कोशिश है कि शिवसेना खुद केंद्र में भी उससे अलग हो जाए, ताकि गठबंधन तोड़ने का ठीकरा उसके सिर न फूटे। पार्टी के एक प्रमुख नेता ने कहा कि शिवसेना के पास अब केंद्र सरकार में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। अलबत्ता प्रधानमंत्री के विदेश से लौटने के बाद इस पर फैसला लिया जा सकता है।

मोदी सरकार में अभी शिवसेना से अनंत गीते भारी उद्योग मंत्री हैं। सूत्रों के अनुसार संसद सत्र को देखते हुए इस मंत्रालय के राज्य मंत्री जीएम सिद्देश्वरा को पूरी तरह तैयारी करने को कहा गया है।

कमजोर पड़ सकता है गणित
महाराष्ट्र में भाजपा ने भले ही अपनी रणनीति से शिवसेना के सत्ता के अरमानों पर पानी फेर दिया हो, लेकिन इससे दिल्ली में उसका संसदीय गणित कमजोर पड़ा है। 545 सदस्यीय लोकसभा में भाजपा का बहुमत है और राजग के साथ 334 सांसदों का समर्थन भी है। दूसरी तरफ 245 सदस्यों वाली राज्यसभा में एनडीए की ताकत 61 सांसदों की ही है। ऐसे में शिवसेना (18 लोकसभा और 3 राज्यसभा) रहे या न रहे उसे लोकसभा और राज्यसभा में ज्यादा अंतर नहीं पड़ता है।

आंकड़ा रहेगा अधूरा
जब किसी महत्वपूर्ण विधेयक को राज्यसभा में मंजूरी नहीं मिले तो संयुक्त बैठक बुलानी पड़ती है। एनडीए की पिछली सरकार में पोटा पर संयुक्त बैठक बुलाई गई थी। इस सरकार में ऐसी स्थिति बनने पर शिवसेना का एनडीए के साथ जरूरी होगा। दोनों सदनों की संयुक्त संख्या अभी 790 है और एनडीए के पास 395 सांसद हैं। जो किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए पर्याप्त हैं। अगर इसमें से शिवसेना के 22 सांसद कम हो जाएं तो संख्या 374 रह जाती है। इसमें एनसीपी के 12 सांसद भी शामिल किए जाएं तो भी यह संख्या 386 होगी। ऐसे में संयुक्त अधिवेशन में एनडीए अल्पमत में रहेगा।

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