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मंगल फतह का राज बयां किया इसरो के वैज्ञानिकों ने

मंगल फतह का राज बयां किया इसरो के वैज्ञानिकों ने

पहले ही प्रयास में भारत मंगल मिशन में कैसे सफल हो गया जबकि अमेरिका एवं रूस जैसे देशों के कई मिशन फेल हो गए थे। वह भी बेहद कम बजट में। यहां एक कार्यक्रम में मिशन ऑफ मार्स (एमओएम) की टीम से फिर यह सवाल पूछा गया।

जवाब स्फूर्ति पैदा करने वाला था। इसरो के प्रमुख के. राधाकृष्णन ने कहा कि हमने दुनिया के फेल हुए अभियानों से सबक लिया। अब तक फेल हुए करीब तीन दर्जन अभियानों की खामियों का बारीकी सेअध्ययन किया और खतरों को दूर किया। इससे पहले ही प्रयास में इसरो का मिशन सफल हो गया।

मिशन ऑफ मार्स के दस वैज्ञानिकों की टीम यहां साइंस पत्रकार पल्लव बाघला और प्रोफेसर सुभद्रा मेनन द्वारा लिखित पुस्तक ‘रीचिंग फॉर दि स्टार-इंडिया जर्नी टू मार्स एंड बियोंड’ के विमोचन के मौके पर मौजूद थी। मार्स मिशन को लेकर परिचर्चा छिडम्ी। मिशन जहां बेहद कम खर्च में तैयार किया गया था वहीं इसकी तैयारियों के लिए भी इसरो को महज आठ महीने मिले। इसलिए यह कई चुनौतियों से भरा था। राधाकृष्णन से यह पूछने पर कि क्या कभी ऐसा महसूस हुआ कि यह नहीं हो पाएगा ? उन्होंने कहा, ‘नहीं, ऐसा कभी नहीं लगा। अर्जुन की तरह हमारा लक्ष्य केंद्रीत रहा पहले चांद, मंगल और अब सूर्य।’
उन्होंने कहा कि इस मिशन की कई खूबियां हैं, कम समय और कम पैसे में यह मिशन तैयार हुआ। फिर जब हम यह कार्य कर रहे थे तो मंगल मिशनों की सफलता दर अच्छी नहीं थी। इसलिए हमने फेल हुए मिशनों की समीक्षा की। मिशन के प्रोजेक्ट डायरेक्टर एस. अरुणन ने बताया कि मंगल पर करीब 50 से अधिक मिशन अब तक भेजे गए हैं लेकिन इनमें से सफल गिने-चुने हुए हैं। हमने पिछले कुछ सालों में विफल हुए करीब तीन दर्जन मिशनों का तीन महीने तक अध्ययन किया। फेल होने के कारणों को देखा और अपने मिशने में उन बिन्दुओं पर विशेष ध्यान केंद्रीय किया। करीब तीन महीने तक अरुणन सिर्फ फेल मिशनों का अध्ययन करते रहे और इस दौरान वे प्रयोगशाला में ही सोते। इससे हर मोर्चे पर कई पहलुओं से खतरे का आकलन किया जा सका। वे कहते हैं, सच मानो तो विश्व में फेल हुए मिशनों ने हमारी सफलता की राह खोली। दूसरे, पहले की तुलना में मौजूद अब उन्नत तकनीकी ने भी हमारा कार्य आसान किया।

मंगल पर कालोनी तो बनेगी ही- अभियान से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रोफेसर यूआर राव ने कहा कि यदि अगले 50 सालों में धरती के बाहर कहीं बसने की संभावना होगी तो वह मंगल ही होगा। यह सिर्फ सोच नहीं है बल्कि जरूरत भी होगी। अगले पचास साल में जब भारत की आबादी 1.8 अरब होगी तो हमें रहने के लिए जगह चाहिए। हो सकता है तब मंगल इसके लिए उपयुक्त निकले। वैसे भी, बेंगलूर में 30 गुणना 45 मीटर का एक प्लाट ढाई करोड़ है और इतनी राशि में मंगल पर जाना संभव हो जाएगा। क्या 50 साल पहले किसी ने अंटार्कटिक में रहने की सोची थी लेकिन आज वहां लोगों का जाना-रुकना इतना आसान हो गया है कि वहां एमटीआर मसाले भी मिल जाते हैं।

क्या मंगल पर मिथेन है ? यह पूछने पर स्पेस अप्लीकेशन सेंटर किरण कुमार ने कहा कि अभी आंकड़े आ रहे हैं। उनका अध्ययन किया जा रहा है। वैज्ञानिक दावे उतने आसान नहीं होते हैं। इसलिए कोई नतीजा निकालने से पहले तथ्यों को कई कसौटियों से गुजरना होता है।

मॉम है ज्यादा आज्ञाकारी-मिशन ऑफ मार्स को धरती से निर्देश देने की टीम की कमान संभालने वाली महिला वैज्ञानिक नदिनी हरिनाथ से पूछा गया कि मॉम के रूप में उन्हें अपनी कौन सी भूमिका सरल लगी। मंगलयान को निर्देश भेजने की या मॉम के रूप में बच्चों को निर्देश देने के।  उन्होंने कहा कि दोनों कार्य चुनौती पूर्ण थे लेकिन मंगलयान ने निर्देशों को सही पालन किया।
   

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