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त्रासदी के 30 साल : जख्म भरे नहीं

भोपाल गैस कांड को हुए लगभग 30 साल हो गए, लेकिन उसके प्रभावितों का जीवन आज भी नर्क बना हुआ है। पॉलोमी बनर्जी की रिपोर्ट

इतिहास के आईने में देखें तो ‘झीलों के शहर’ के रूप में विख्यात भोपाल महिला सशक्तीकरण, खूबसूरती और कला की मिसाल रहा है। 1890 से 1926 तक यहां बेगमों का राज था। इस शहर को जरी के शानदार काम के लिए जाना जाता था, लेकिन  2 और 3 दिसंबर 1984 के बीच की रात ने सब कुछ तबाह कर दिया।

इस दुर्घटना को तीस साल हो गए, लेकिन यहां के लोग अब भी शारीरिक और भावनात्मक रूप से आहत हो रहे हैं। दुर्घटना के बाद से अब तक प्रभावितों के लिए लड़ रहे अब्दुल जब्बार याद करते हैं, ‘1969 में जब यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) भोपाल  आई थी, तब हम सभी को पता था कि यह कंपनी कीटनाशक बनाती है। यहां के तत्कालीन विधायक, जो  कम्युनिस्ट पार्टी के थे, ने शहर में संयंत्र लगाने का जबरदस्त विरोध किया था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि भोपाल में यूनियन कार्बाइड का संयंत्र लगने से देश में हरित क्रांति को बढ़ावा मिलेगा।’ इस दुर्घटना में जब्बार खुद अपने माता-पिता और भाई को खो चुके हैं। भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) संयंत्र में पूर्व ऑपरेटर टीआर चौहान कहते हैं, ‘प्रबंधन ने हमें बताया था कि पश्चिमी वर्जीनिया में पिछले 20 सालों से चल रहे हमारे संयंत्र के अनुभवों के आधार पर एमआईसी को डिजाइन और उसका निर्माण किया गया है। हालांकि इस भीषणतम दुर्घटना के बाद हमें पता चला कि दोनों में बहुत अंतर था। वह यह भी बताते हैं, ‘इससे भी बड़ी बात यह कि इस दुर्घटना के बाद कंपनी  ने सिर्फ श्रमिकों के लिए क्षेत्र से निकासी की योजना बनाई, उनके लिए नहीं, जो संयंत्र के आसपास रह रहे थे। यहां तक कि कंपनी की संशोधित नीति में लोगों को चेतावनी देने के लिए सायरन बजाने की अवधि भी पांच मिनट कर दी गई।’

चल रहा है मुकदमों का सिलसिला
इसके बाद 1984 से षड्यंत्र, घोटालों, आरोप-प्रत्यारोप, दोषारोपण, धरना-प्रदर्शन और मुकदमों का सिलसिला चल रहा है। 1984 में यूनियन कार्बाइड का सीईओ वारेन एंडरसन दुर्घटना के चार दिन बाद भारत आया, गिरफ्तार हुआ और देश से बाहर जाने के लिए छोड़ भी दिया गया। जब इस साल 29 सितंबर को अमेरिका में उसकी मौत हुई, तब उसकी मौत पर भोपाल में मनने वाले जश्न में लोगों का गुस्सा साफ झलका। यहां यह भी तथ्य है कि एंडरसन को कभी सजा नहीं मिल पाई।

अब भी न्याय की तलाश
अब 10 नवंबर से एक बार फिर कुछ सामाजिक आंदोलनकर्मी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनकी प्रमुख मांग है कि त्रासदी के शिकार सारे पीड़ितों को और मुआवजा दिया जाए तथा इस दुर्घटना में हुई मौतों की संख्या को सही किया जाए। आंदोलनकर्मियों का यह भी कहना है कि बहुत से प्रभावित शारीरिक रूप से कमजोर हुए हैं और उनके काम करने की क्षमता प्रभावित हुई है। आंदोलनकर्मी सतीनाथ सारंगी का कहना है, ‘डॉक्टर अब तक प्रभावितों का इलाज कर रहे हैं और इलाज के लिए दी जा रही दवाएं नशीली हैं। लंबे समय से बेतहाशा इस्तेमाल की जा रही नशीली, दर्दनाशक दवाओं और स्टेरॉयड की वजह से इन्हें दूसरी कई नई बीमारियां पैदा हो रही हैं, जैसे किडनी डैमेज आदि। और यह सब कुछ यूनियन कार्बाइड की वजह से हो रहा है, जिसने एमआईसी की प्रकृति नहीं बताई। नतीजा यह हुआ कि डॉक्टर इसका सही एंटीडॉट तैयार नहीं कर पा रहे हैं।’
सन 2000 में भोपाल मेडिकल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) को सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार शुरू किया गया, लेकिन यह अस्पताल भी विवादों से परे नहीं रह पाया। 2011 में 279 प्रभावितों ने आरोप लगाया कि उनकी जानकारी के बगैर अस्पताल ने उन पर नई दवाओं का परीक्षण किया। सारंगी का कहना है कि प्रभावितों के बीच टीबी और कैंसर जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने भी इस बात को स्वीकार किया  है कि प्रभावित क्षेत्रों में कैंसर के ज्यादा मरीज पाए गए हैं। हालांकि बीएमएचआरसी के निदेशक मनोज पांडेय इस बात को स्वीकार तो करते हैं, लेकिन यह भी जोड़ते हैं कि तंबाकू सेवन ने स्थिति ज्यादा खराब की है।

बाद की पीढ़ी भी हुई है प्रभावित
इसका सबसे वीभत्स रूप यह है कि जहरीली गैस का असर बाद की पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ रहा है। मोहम्मद अल्तमश (वर्तमान में उम्र आठ साल) कई शारीरिक विकृतियों के साथ पैदा हुआ। उसके परिवार वालों को कहना है कि प्रभावित क्षेत्र में वंशानुगत विकृति मिलना आम बात है। 1985 से 1994 के बीच के आंकड़े के आधार पर आईसीएमआर द्वारा किए गए चिकित्सकीय अध्ययन में यह बात सामने आई कि प्रभावित क्षेत्रों में इस बीच जन्मे प्रति हजार बच्चों में से 14.2 फीसदी बच्चे वंशानुगत विकृति के शिकार पाए गए, जबकि नियंत्रित या प्रभाव क्षेत्र से बाहर यह औसत 12.6 प्रतिशत का है। गांधी मेडिकल कॉलेज के पूर्व डीन और प्रभावितों का इलाज करने वालों में से एक डॉक्टर एनपी मिश्रा इस बात से इनकार करते हैं कि एमआईसी के प्रभाव में एक बार आए व्यक्तियों में इसका लंबे समय तक प्रभाव रह सकता है। हालांकि डॉ. मिश्रा आईसीएमआर की उस रिव्यू कमेटी में थे, जिसने लोगों पर एमआईसी के असर का अध्ययन किया था। उधर आंदोलनकर्मी व शिक्षाकर्मी अनिल सदगोपाल और डॉक्टर सुजीत कुमार दास ने सुप्रीम कोर्ट में 1988 में दायर रिपोर्ट में कहा है कि ढेर सारे इंडियन रिसर्च प्रोजेक्ट्स इस बात को स्थापित करते हैं कि एमआईसी खून में घुल जाता है और अलग-अलग ऊतक अवयवों के साथ प्रतिक्रिया कर उनमें मिल जाता है और यह मल्टी सिस्टमेटिक डिसऑर्डर का कारण बनता है।’

मिट्टी और जल भी हुए प्रदूषित
इसका असर सिर्फ मनुष्यों पर ही नहीं पडम है, बल्कि इसने  पानी और मिट्टी तक को प्रदूषित किया है। सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार, ‘परीक्षणों से यह साबित हो चुका है कि इसने भारी मात्रा में मिट्टी और जमीन के भीतर के जल को प्रदूषित किया है।’

मैं अब काम नहीं कर सकता। मेरे बाद मेरी बेटियों को कौन देखेगा?
50 साल की नूरजहां दो दिसंबर 1984 की रात को याद करती हैं, ‘आज भी लगता है, जैसे वह कल की बात हो। तब मैं सिर्फ 20 साल की थी, लेकिन मेरी शादी हो चुकी थी और उस वक्त मेरे तीन बच्चे थे। उस रात मैं अपने माता-पिता के घर गई हुई थी, जो इसी इलाके में रहते हैं। मैं सो चुकी थी, लेकिन आंखों में जलन होने की वजह से जाग गई। मैं सांस नहीं ले पा रही थी।’ बच्चे को लेकर नूरजहां भागीं। उनके भाई ने उनके छोटे बेटे अफरोज को उठा रखा था। दूसरे दिन वे अफरोज और उसकी बहन को लेकर डॉक्टर के यहां गए। वह बताती हैं, ‘मेरी बेटी की आंखें फूल गई थीं। वह देख नहीं पा रही थी। अफरोज बहुत सारे जहरीले धुएं को पी गया था, जिसकी वजह से उसका पेट फूल गया था।’ प्राथमिक उपचार के बाद नूरजहां परिवार समेत उस जगह से दूर चली गईं। वह बताती हैं, ‘अफरोज की सेहत लगातार गिर रही थी। उसके पेट में लगातार दर्द हो रहा था और वह उल्टियां कर रहा था। हम उसे सरकारी अस्पताल ले गए, लेकिन डॉक्टर ने कुछ दवा देकर यह कहते हुए वापस भेज दिया कि कुछ दिन में दर्द कम हो जाएगा, लेकिन इसके बाद उसे खून की उल्टियां होने लगीं। डॉक्टरों ने कहा कि किडनी डैमेज हो गई है।’

बाद में अफरोज ने शादी कर ली और उसे तीन बेटियां हैं। वह कहता है, ‘मैं वेल्डिंग का काम करता था, लेकिन लगातार डायलिसिस और सर्जरी के बाद अब मैं काम नहीं कर पाता। मेरी तीन बेटियां हैं। मेरे बाद उन्हें कौन देखेगा?’

सरकार उसे गैस प्रभावितों में नहीं मानती, क्योंकि उसका इलाज उसकी मां के कार्ड पर बीएमएचआरसी में हुआ है। नूरजहां कहती हैं, ‘मुआवजे के लिए अदालत उम्र का प्रमाण पत्र मांगती है। हम अशिक्षित लोग हैं। जब हम अफरोज को स्कूल में डाल रहे थे, तब एक शिक्षक ने कहा कि लडम्का एडमिशन की उम्र पार कर चुका है, इसलिए आप लोग इसकी उम्र कम कर दें। हम तैयार हो गए। हमने यह सपने में भी नहीं सोचा था कि इन कागजात का इस्तेमाल बाद में इस सबूत के तौर पर होगा कि वह उस त्रासदी के बाद पैदा हुआ है।’ इस परिवार में अफरोज अकेला नहीं है, जिसे स्वास्थ्य समस्या है। नूरजहां बताती हैं, ‘मेरे बड़े बेटे की शादी 10 साल पहले हो चुकी है, लेकिन उसे कोई बच्चा नहीं है। लोग कहते हैं कि जहरीले धुएं की वजह से उसकी प्रजनन क्षमता प्रभावित हो गई है। मेरा सबसे छोटा बेटा इकबाल उस त्रासदी के एक साल बाद पैदा हुआ। पैदाइश के कुछ ही दिन बाद उसके कंधे पर एक टय़ूमर हो गया। हम लोग डर गए कि कहीं यह कैंसर तो नहीं, लेकिन शुक्र है कि ऑपरेशन के बाद कोई समस्या नहीं आई। हालांकि उल्टियों की बीमारी उसे अब तक है।’ नूरजहां और उसके पति दोनों को अब तक सांस की समस्या है। उनके पति और बड़ा बेटा मजदूरी करते हैं। इस पूरे परिवार की नजर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर टिकी है।

बेटा काम नहीं कर पाता, आय का दूसरा कोई स्रेत नहीं
70 साल की चिरौंजी बाई को 1990 में भोपाल में गैस विडो कॉलोनी में एक घर मिला। खुली नालियां, गड्ढों से भरी सडम्कें और गंदगी यहां आम है। निवासी शिकायत करते हैं कि बारिश के मौसम में सडम्कें नालियों के पानी से भर जाती हैं। चिरौंजी बाई कहती हैं, ‘यहां तीन चरणों में घर बने हैं। बाद के वर्षो में बहुत सारी विधवाएं अपना घर बेच कर किराये पर रहने दूसरी जगह चली गईं।’ वह आगे बताती हैं, ‘इस दुर्घटना के नौ महीने बाद मैंने अपना पति खो दिया। उनके शरीर में ढेर सारा जहरीला धुआं भर गया था। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनके आंतरिक अंग काफी प्रभावित हो गए थे, जिन्हें ठीक नहीं किया जा सका।’

चिरौंजी बाई खुद छाती में दर्द और सांस की समस्या का शिकार हो गई थीं। इस त्रासदी में उनकी बेटी की जान चली गई और पूरे परिवार की सेहत चौपट हो गई। वह कहती हैं, ‘मेरी बेटी की शादी एक ऐसे व्यक्ति से हुई थी, जो भोपाल से बाहर रहता था, लेकिन उस रात वह यहां आया हुआ था। मेरा पोता बीमारियों के साथ पैदा हुआ। उसे सांस की समस्या है और वह भारी काम नहीं कर पाता। मेरा 45 साल का बेटा काम नहीं कर सकता। मेरे पति की दुकान थी, जो हम लोगों ने बेच दी, क्योंकि इस स्थिति में कोई नहीं था, जो काम करता।’

चिरौंजी बाई को मुआवजे के तौर पर 10 लाख रुपये मिले हैं, लेकिन उनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है, इस वजह से उनका परिवार अब भी वित्तीय संकट का सामना कर रहा है। 10 नवंबर को चिरौंजी बाई दूसरे प्रभावितों के साथ दिल्ली में न्याय के लिए संघर्ष करने वालों की टीम के साथ आई हुई थीं।

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