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विश्वास मत के बाद

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडनवीस के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की अल्पमत सरकार को विधानसभा में विश्वास मत प्राप्त हो गया है। हालांकि ध्वनि मत से विश्वास मत हासिल करने के तरीके पर काफी विवाद हो रहा है। चुनाव के बाद से जो सवाल लगातार मौजूद था, वह यह था कि क्या शिवसेना सरकार में शामिल होगी? शिवसेना ने आखिरकार विपक्ष में बैठना स्वीकार किया और पहले दिन विधानसभा में हंगामा करने की भी कोशिश की। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा और शिवसेना के रिश्ते फिर से बनने की संभावना खत्म हो गई है। दोनों ही पार्टियों ने बातचीत और सुलह के लिए अभी गुंजाइश रख छोड़ी है, लेकिन दोनों ही पार्टियां अपनी-अपनी शर्तों से डिगने को तैयार नहीं हैं। विवाद की मुख्य वजह यह है कि शिवसेना को भाजपा से करीब आधी सीटें मिली हैं और भाजपा उसकी ताकत के आधार पर उसे मंत्री पद देना चाहती है। शिवसेना की मांग ज्यादा है। शिवसेना महाराष्ट्र में भाजपा से कहीं अधिक ताकतवर रही है, इसलिए सीनियर पार्टनर की भूमिका में रही। अब जूनियर पार्टनर बनना उसे रास नहीं आ रहा है। भाजपा के पास सीटों के गणित के अलावा भी कई सारे पत्ते हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी उसे बाहर से समर्थन दे रही है। शिवसेना के अनंत गीते केंद्र सरकार में मंत्री हैं और शिवसेना की ताकत का सबसे बड़ा आधार बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में उसका भी राज है। इसलिए भाजपा सख्ती से मोल-भाव करने में लगी हुई है।

यह अभी नहीं कहा जा सकता कि भविष्य में भाजपा सरकार कैसे चलेगी। राकांपा कब तक उसे इस तरह समर्थन देती रहेगी? फिर अल्पमत सरकार चलाने के अपने खतरे होते हैं। सदन में बहुमत न हो, तो विधायी कार्यों में दिक्कत होती है, एक-एक बिल पास करवाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। यह सही है कि कोई पार्टी, खासकर राकांपा तुरंत सरकार गिराकर अलोकप्रिय होने का जोखिम नहीं उठा सकती, बल्कि किसी भी पार्टी के विधायक तुरंत चुनाव नहीं चाहेंगे, शिवसेना के विधायक भी नहीं। चुनाव नतीजे आने के बाद से ही भाजपा की यह रणनीति थी कि दबाव में आने के बदले अल्पमत सरकार बनाना बेहतर है। संभवत: राकांपा से उसका तालमेल काफी पहले हो गया था। चुनावों के पहले भी जब भाजपा ने शिवसेना से तालमेल न करने का फैसला किया था, तो उसी दिन राकांपा ने भी कांग्रेस के साथ रिश्ते तोड़ने की घोषणा की थी। हो सकता है कि यह राकांपा की दूरगामी नीति का हिस्सा हो और वह कांग्रेस से रिश्ता स्थायी रूप से तोड़ने की सोच रही हो। कांग्रेस और राकांपा का आधार उसी तरह एक जैसा है, जैसे भाजपा व शिवसेना का है। जैसे शिवसेना से रिश्ता तोड़ भाजपा ने अपनी ताकत बढ़ा ली, वैसे ही राकांपा को भी लग रहा हो कि वह कमजोर होती कांग्रेस का महाराष्ट्र में विकल्प बन सकती है और इसी के तहत फिलहाल उसने भाजपा को समर्थन देने का फैसला किया हो।

भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अल्पमत में होते हुए भी सुशासन के अपने वादे को निभाना है। अगर शुरुआती दिनों में ही फडनवीस एक कुशल  प्रशासक की छवि बना पाए, तो भाजपा का समर्थन राज्य में बढ़ेगा। भाजपा का कयास यह भी होगा कि सत्ता से दूर रहकर शिवसेना के विधायकों में बेचैनी बढ़ेगी। पंद्रह साल बाद सत्ता में बैठने का योग आया है, उसे गंवा देना काफी नेताओं को नागवार गुजर रहा होगा। ऐसी खबरें आ ही रही थीं कि शिवसेना के आधे विधायक सरकार में शामिल होने के पक्ष में हैं। विश्वास मत तो हो गया, पर इसके बाद महाराष्ट्र की राजनीति काफी नाटकीय होने वाली है और कम से कम शिवसेना का भविष्य तो उससे तय हो जाएगा।

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