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पूरब से भारत का गहराता रिश्ता

जिस तारीख को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, उसी तारीख से वह अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर बेहद सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। अपने शपथ-ग्रहण समारोह में दक्षेस के नेताओं और मॉरीशस के प्रधानमंत्री को उन्होंने न्योता दिया। उस समारोह में इन पड़ोसी देशों के नेताओं की उपस्थिति प्रधानमंत्री की इस दृढ़ता पर मुहर लगा चुकी थी कि वह वैश्विक मोर्चे पर सक्रिय रहेंगे। उनके अब तक के करीब पांच महीने के शासनकाल में घरेलू मोर्चे पर ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्वच्छ भारत’ जैसे कार्यक्रमों का शुभारंभ हुआ, वहीं साथ-साथ भारत की विदेश नीति में उद्देश्यपूर्ण राजनय की नीति अपनाई गई। प्रधानमंत्री पहले चरण में भूटान (छह-सात जून), ब्रिक्स समिट के लिए ब्राजील (13-16 जुलाई), नेपाल (तीन-चार अगस्त), जापान (30 अगस्त-03 सितंबर) और उसके बाद  अमेरिका गए व संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी भाग लिया। अब उनके दूसरे चरण की यात्रा पूरब की ओर है। दस दिनों की उनकी यह यात्रा ग्यारह नवंबर से शुरू हुई है और इसमें तीन देशों, म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया और फिजी का दौरा शामिल है। उनकी म्यांमार-यात्रा के दो मुख्य उद्देश्य बताए गए हैं। पहला, 12वां भारत-आसियान शिखर सम्मेलन और दूसरा, नौवां पूर्वी एशिया सम्मेलन। इस यात्रा के दौरान वह म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सेन से भी मिले। इसके बाद उनका ऑस्ट्रेलिया का द्विपक्षीय दौरा है, जहां प्रधानमंत्री वहां के पीएम समेत ऑस्ट्रेलियाई नेताओं से मिलेंगे, जहां जी-20 सम्मलेन है। उसके बाद वह फिजी रवाना होंगे, जहां द्विपक्षीय वार्ता के साथ-साथ वह प्रशांत महासागर के देशों के साथ एक सम्मेलन करेंगे।  इस तरह, उनकी यह लंबी यात्रा वैश्विक मोर्चे पर उनकी उपस्थिति के सिलसिले की एक और कड़ी है।
 
म्यांमार पहुंच प्रधानमंत्री ने वहां के राष्ट्रपति थीन सेन से मुलाकात की और सभी द्विपक्षीय मुद्दों पर उनसे चर्चा की। हमारे लिए म्यांमार कूटनीतिक, आर्थिक और सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है और बीते कुछ वर्षों से म्यांमार लगातार बुनियादी परिवर्तनों का गवाह बन रहा है। इस देश ने सैनिक और तानाशाही सरकार की जगह लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाई है, जिसके कारण भारत व म्यांमार के बीच सहयोग और बढ़ गया है। बीते मंगलवार की मोदी-सेन की मुलाकात यह एहसास कराती है कि रिश्तों में गरमी आई है और तमाम क्षेत्रों में प्रगति हुई है। इसमें तीन तत्व महत्वपूर्ण हैं। पहला, सुरक्षा। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों की सुरक्षा के लिए म्यांमार अति महत्वपूर्ण हो जाता है और इसलिए यह अहम है कि भारत और म्यांमार की सुरक्षा एजेंसियों के बीच सभी तरह के सहयोग होते रहें। दूसरा तत्व ऊर्जा जरूरतों से जुड़ा है और तीसरा ‘कनेक्टिविटी’ से।

म्यांमार के जरिये भारत आसियान देशों से जुड़ता है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड को जोड़ने के लिए एक सड़क बनाई जा रही है, जो 2018 तक बन जाएगी और यह व्यापारिक मार्ग करीब 3,200 किलोमीटर लंबा होगा। निस्संदेह, इससे कारोबार में तरक्की दर्ज होगी। इसमें कोई दोराय नहीं कि आज की तारीख में चीन भी म्यांमार में बहुत सक्रिय है और म्यांमार का शासन भारत और चीन के बीच संतुलन चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे से वहां की सरकार को यह महसूस होगा कि उसके लिए यह संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है।

भारत-आसियान शिखर सम्मेलन से ग्यारह देशों के बीच रिश्ते में एक किस्म की गरमाहट आएगी। आसियान के दस देश हैं- म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम, फिलीपींस, मलयेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया और ब्रुनेई। लगभग 20 साल की हमारी ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ आज इस मुकाम पर पहुंच चुकी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया कि ‘लुक ईस्ट’ काफी नहीं है, बल्कि जरूरी है ‘ऐक्ट ईस्ट।’ यानी योजना कागज पर न हो, बल्कि लागू हो। आसियान के साथ हमारे सांस्कृतिक संबंध काफी पुराने हैं। एक उदाहरण देखिए कि राम-कथा के अलग-अलग रूप आसियान के लगभग सभी देशों में प्रचलित हैं। साफ है, इस सांस्कृतिक धरोहर की अनदेखी होती रही है और अब इसके संरक्षण-संवर्धन की जरूरत है। जहां तक आसियान से द्विपक्षीय कारोबार का संबंध है, तो यह फिलहाल करीब 80 बिलियन डॉलर है और ऐसा माना जाता है कि अब भी इसमें काफी अवसर और संभावनाएं हैं। आसियान को हमारा निर्यात ज्यादा है और वहां से हम आयात कम कर रहे हैं। इसलिए सेवा और निवेश के क्षेत्र में मुक्त व्यापार बेहद अहम हो जाता है, जिस पर भारत का जोर है। इसके अलावा, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि आसियान व भारत के सामने एक समान सामरिक चुनौतियां हैं। ये चुनौतियां आतंकवाद और समुद्री लूट की घटनाओं से जुड़ी हैं, जो हाल के समय में बढ़ गई हैं। दक्षिण थाईलैंड, फिलीपींस और इंडोनेशिया आतंकवाद का शिकार रहा है। इसलिए इन मोर्चो पर आसियान के देश और भारत एक साथ मिलकर कारगर काम कर सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस यात्रा का एक उद्देश्य पूर्वी एशिया शिखर बैठक में शामिल होना भी है। पूर्वी एशिया शिखर बैठक में आसियान के दस देशों के अलावा, आठ और देश हैं। ये देश हैं- ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, रूस और भारत। इस बैठक के जरिये यह देखने की कोशिश हो रही है कि कैसे संतुलित रूप से पूरे क्षेत्र का विकास संभव हो। इस क्षेत्र में सदस्य देशों की समृद्धि और सुरक्षा को बरकरार रखना और बढ़ाना इस बैठक का लक्ष्य है। आसियान के साथ ऊर्जा, मुक्त व्यापार और समुद्री लूट के खिलाफ सहयोग के अलावा इसमें भारत के विशेष योगदान की अपेक्षा रहती है। इस बैठक का एक सहायक विषय यह भी है कि चीन के उत्थान के बीच कैसे क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहे। दरअसल, चीन अपने हितों को साधने के लिए आक्रामक रुख अख्तियार कर लेता है। इसलिए यह समिट अपने उद्देश्य की पूर्ति में भारत की भूमिका अहम मानती है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने चुनौती भी है और अवसर भी। चुनौती इस मायने में कि कैसे चीन और अन्य सदस्य देशों के साथ भारत अपने संबंध को संतुलित करे और अवसर इस मायने में कि अन्य देश भारत की तरक्की को देखना चाहते हैं, क्योंकि वे इस तरक्की से खुद को जोड़ते हैं। ये देश भारत की उन्नति में सबका लाभ मानते हैं। वैसे अतीत में भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जरिये दो ध्रुवों के बीच संतुलन साध चुका है। लेकिन इस बार उसे पूर्वी एशिया शिखर बैठक के मंच तले अपने हित और क्षेत्रीय संतुलन को साधना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा ऑस्ट्रेलिया और फिजी तक जारी रहेगा, जो एक अलग चर्चा का विषय है, क्योंकि एक तो वहां द्विपक्षीय वार्ताएं होंगी, जिनमें तमाम जरूरी व प्रासंगिक मुद्दे शामिल किए जाएंगे और फिर भारतवंशियों को आकर्षित करने तथा उनके हित साधने के मसले भी हैं। 
      (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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