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नफरत वाले दुल्हनिया ले जाएंगे

पाकीजा फिल्म का वह दृश्य कोई कैसे भूल सकता है, जिसमें राजकुमार ट्रेन की बर्थ पर सो रही मीना कुमारी के पांव देखते हैं और मुग्ध हो जाते हैं। ‘आपके पांव देखे, बहुत खूबसूरत हैं। इन्हें जमीन पर मत रखिए, मैले हो जाएंगे’- यह संवाद भी कोई कैसे भूल सकता है? अब आप सोच सकते हैं कि जिस देश में सिर्फ पांव देखकर प्रेम हो जाता है, वहां अगर पूरी लड़की दिख जाए, तो क्या हो जाएगा। हमारे संस्कृति रक्षक यह समझते हैं, इसलिए वे कोशिश करते हैं कि किसी लड़की की नजर में कोई लड़का या किसी लड़के की नजर में कोई लड़की न पड़ जाए। अब यह भगवान की लीला है कि दुनिया में जितने लड़के हैं, उतनी ही लड़कियां हैं, इसलिए यह कोशिश पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाती, पर कोशिश करना संस्कृति के संरक्षकों का कर्तव्य है।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रबंधकों ने इसी तरह की समझदारी दिखाते हुए यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में लड़कियों के आने पर पाबंदी लगा रखी है। उनका कहना है कि अगर लड़कियां आएंगी, तो पीछे-पीछे लड़के भी आएंगे, इस तरह लाइब्रेरी में इतनी भीड़ लग जाएगी कि संभालना मुश्किल हो जाएगा। भीड़ का तो बहाना है, असली फिक्र यह है कि लड़कियों के पीछे लड़के आएंगे, दोनों एक-दूसरे को नख-शिख देखेंगे। जिस देश में पांव देखकर प्रेम हो जाता है, वहां सैकड़ों लड़के-लड़कियां एक-दूसरे को देखेंगे, तो हो सकता है कि प्रलय आ जाए।

हिंदू हों या मुस्लिम, दोनों की संस्कृति-संरक्षकों का दुश्मन एक ही है- प्रेम। उन्हें यकीन है कि एक लड़की और लड़के के बीच प्रेम भी पूरी संस्कृति को तबाह कर सकता है। इससे यह भी साबित होता है कि संस्कृति की रक्षा सिर्फ नफरत से हो सकती है। इसलिए प्रेम से नफरत करो और नफरत से प्रेम करो। नफरत सदाचार है और प्रेम विकार है। संस्कृति तभी बची रहेगी, जब दुनिया में सब लड़के-लड़कियां एक-दूसरे से नफरत करेंगे। तब फिल्में भी ऐसी ही बनेंगी ‘नफरत वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘जब तक है नफरत’, ‘अमर नफरत।’ हमें ऐसा आदर्श समाज बनाने की जरूरत है और गैर-जिम्मेदार लड़के-लड़कियां ‘किस’ करने पर आमादा हैं।

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  • Web Title:नफरत वाले दुल्हनिया ले जाएंगे