DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

किसानों की लामबंदी से धान के कटोरे में उबाल

धान का कटोरा यानी छत्तीसगढ़ गरमा रहा है। वजह धान ही है। केंद्र सरकार की नई नीतियों के चलते धान की सरकारी खरीद पर बोनस बंद कर दिया गया है और प्रति एकड़ दस क्विंटल धान की खरीद सीमा तय कर दी गई है। इसे लेकर छत्तीसगढ़ ही नहीं, अन्य राज्यों के किसान संगठन भी लामबंद हो रहे हैं। इनमें ओडिशा के वे किसान नेता भी शामिल हैं, जो लंबे समय से अपने राज्य में धान की खरीद के लिए छत्तीसगढ़ मॉडल अपनाने की मांग करते रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में धान-खरीद का जो मॉडल लोकप्रिय हुआ, उसकी शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने वर्ष 2001 में की थी। अपने शासनकाल में उन्होंने राज्य के किसानों का धान कर्ज लेकर खरीदवाया था। बाद में भाजपा सत्ता में आई और रमन सिंह सरकार ने इस मॉडल को और मजबूत किया। भाजपा को ग्रामीण इलाकों में किसानों का व्यापक समर्थन मिलने की एक वजह यह भी रही। धान और सस्ता चावल देने वाली नई योजनाएं शुरू करने के कारण रमन सिंह ‘चाउर वाले बाबा’ के नाम से मशहूर हुए। लेकिन अब वही धान और चावल रमन सिंह के लिए संकट खड़ा कर रहा है। नई नीतियों के चलते समूचे छत्तीसगढ़ में किसानों को लामबंद करने की कवायद शुरू हो चुकी है।

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा ने धान का मूल्य 2,100 रुपये प्रति क्विंटल करने का वादा किया था और कांग्रेस ने 2,000 रुपये प्रति क्विंटल का। चुनाव बाद रमन सिंह ने घोषणा की थी कि धान-खरीदी के बाद किसानों को प्रति-क्विंटल 300 रुपये का बोनस तत्काल दिया जाएगा। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद रमन सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखकर धान का समर्थन मूल्य बढ़कर 2,100 रुपये प्रति क्विंटल करने का अनुरोध किया था। रमन सरकार किसानों के साथ खड़ी दिखना चाहती थी और साथ ही वह कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने के प्रयास में थी। पर केंद्र की सत्ता बदली, तो नई नीतियों ने रमन सिंह के लिए संकट पैदा कर दिया है। पर अब केंद्र में भाजपा की सरकार है, जो किसानों को बोनस देने के पक्ष में नहीं है। दूसरी तरफ, कांग्रेस किसानों के आंदोलन का नेतृत्व कर रही है।

कांग्रेस अब राज्य के किसानों के बीच जाकर उन्हें समझा रही है कि भाजपा सरकार ने किसानों के साथ छल किया है। उधर, किसान संगठन भी इस सवाल को लेकर सड़क पर उतर रहे हैं। इनकी मांग है कि किसानों से धान की खरीद प्रति एकड़ दस क्विंटल की बजाय पूर्ववत रखी जाए। इसके अलावा, उनकी यह भी मांग है कि धान का समर्थन मूल्य 2,100 रुपये प्रति क्विंटल और 300 रुपये बोनस की भी घोषणा की जाए। इससे सिर्फ रमन सरकार ही नहीं, आने वाले दिनों में केंद्र के लिए भी समस्या पैदा हो सकती है, क्योंकि अन्य राज्यों से भी यह मांग उठ सकती है।
     (ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:किसानों की लामबंदी से धान के कटोरे में उबाल