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शांति का पाखंड

दुनिया शांति की चाह रखने वालों से भरी हुई है। ऐसा देश, प्रांत, शहर, गांव मिलना असंभव है, जहां शांति चाहने वाले बहुमत में न हों। तो फिर क्या कारण है कि दुनिया इतनी अशांत है? अ न्यू अर्थ  किताब में एक्हर्ट टोल्ले इसका जवाब देते हैं। वह कहते हैं कि हमारे भीतर शांति चाहने वाली शक्ति से कहीं अधिक ताकतवर ‘शांति का नाटक’ चाहने वाली शक्ति है। इस शक्ति को संघर्ष चाहिए। यह जबर्दस्त प्रतिक्रियावादी है।

एक्हर्ट आगे कहते हैं कि यह शक्ति आरोप को प्रत्यारोप और प्रश्न को प्रतिप्रश्न में बदलती रहती है। इसे इस बात की जिद होती है कि आपको विजयी पात्र बनाया जाए। दरअसल, खुद को विजयी बनाने की सोच हमें हमेशा एक मानसिक युद्ध में उलझाए रखती है। ऐसा सामूहिक स्तर पर भी संभव है। ‘हम सही हैं और वे गलत’ इस सामूहिक सोच ने मानवता को काफी चोट पहुंचाई है। इसने दो देशों, दो जातियों, दो समुदायों और यहां तक कि दो परिवारों को उग्र विचारधाराएं दीं। इससे उग्र प्रतिस्पर्धात्मक परिवेश पैदा हुआ। आप अपने आस-पास देखें, तो आपको ऐसे परिवार आसानी से मिल जाएंगे, जहां जमीन का कोई विवाद चल रहा हो। ऐसे घर का प्रत्येक सदस्य इस अशांति से खुद को घिरा पाता है। वैसे प्रत्यक्षत: हम यही पाते हैं कि सभी शांति की चाह रखने वाले हैं। पर यह कैसे संभव है कि हमने ही अशांति पैदा की और हम शांति चाहते हैं? यह सायास नहीं है कि जब सबसे ज्यादा तनातनी होती है, तो शांति की बात भी सबसे अधिक होती है। ऐसा नहीं है कि तब शांति की जरूरत अधिक होने के कारण ऐसा होता है। दरअसल, तब ‘शांति का नाटक’ भी अपने चरम पर होता है।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने गलत नहीं कहा है कि शांति किसी समझौते पर नहीं, आपकी चाह पर निर्भर करती है। और चाह पैदा करना आसान नहीं, क्योंकि ऐसा होता, तो सभी बुद्धत्व को हासिल होते।

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