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ठहरे हुए दिन

कभी-कभी लिखने का इतना मन करता है कि काश, गति से आते ख्यालों को उसी अनुपात में, उतनी ही तीव्रता से कह पाता। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें दिमाग भले खाली-खाली लगता हो, पर असल में वह इतना भारी होता है कि कुछ करने लायक नहीं रह पाता। कुछ-कुछ वैसा ही, जैसा कि हम बिल्कुल नए तरीके से सोचना चाहें, उस सोचे हुए अजाने ख्याल को ऐसी भाषा में लिखना चाहें, जो हमने भी कभी इस्तेमाल न की हो। उसे कहने के लिए घंटों तक एक-एक शब्द पर ठहरते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करना। लेकिन हर बार ‘दिवाल’ पर टंगी घड़ी की तरह हम भी हर बारह घंटे बाद ‘खुद बखुद’ वही वक्त दोहरा रहे होते हैं। उस दोहराने में दिन बदलता है, तारीख बदलती है, साल बदलता है, पर हम सोए हुए मुंह की तरह बदबू से भरे रहते हैं। इन बीतते दिनों में यह मेरी ऊब से बचने की कोशिश है, जो मेरे भीतर से निकलकर मेरे व्यक्तित्व पर छा गई है। यह किसी शैली में लगातार लिखते रहने की छटपटाहट हो सकती है। हो सकता है कि यह किसी और विधा में जाने से पहले का अवकाश हो। या कि एक तरह से उन सारे इकहरे अनुभवों को दोहराते रहने से कोई चीज अंदर तक गड़ी रह गई हो। सोचता हूं, इसी तरह से लिखते रहने के बाद भी मेरे पास बहुत कुछ बचा रह गया है। हो सकता है कि कुछ भी निकलकर सामने न आ पाए। या हो सकता है कि इस संक्रमण काल में कुछ संधियों, समासों, कारक चिन्हों के बाद कोई मेरे इंतजार में वहीं खपरैल वाले आंगन में मिल जाए।
 करनी चापरकरन ब्लॉग से

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