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तालीम के बगैर

गए सोमवार को एक उत्तर नाइजीरियाई शहर में फिदायीन हमलावर ने स्कूल में धमाके किए, जिसमें करीब 50 बच्चे मारे गए। हालांकि बोको हरम ने, जो कि नाइजीरिया का सबसे घातक कट्टरपंथी संगठन है, इस संपादकीय के लिखे जाने तक इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, मगर धमाके के तौर-तरीके बताते हैं कि इसी आतंकी संगठन की यह करतूत है। पहले भी इसने कैंपस में घुसकर कई छात्रों की हत्याएं की हैं। बोको हरम के सरगना ने अपने समर्थकों को खुलेआम कहा कि वे स्कूलों को निशाना बनाएं। पाकिस्तान भी इस तरह के फसादों से परिचित है, क्योंकि इलाकाई दहशतगर्द संगठन, खास तौर पर प्रतिबंधित संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने खैबर-पख्तूनख्वा और फाटा में सैकड़ों स्कूलों में धमाके किए। यही नहीं, बलूचिस्तान में भी कट्टरपंथियों ने स्कूलों पर हमले की धमकियां दी थीं। अफगानिस्तान में साल 2001 में तालिबान के पतन के बाद से हालात सुधरे हैं। हालांकि, लड़कियों की तालीम पर आतंकी संगठनों ने पाबंदी लगा रखी है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सीरिया के कई हिस्सों में आतंकी संगठन आईएसआईएस ने स्कूल बंद करा दिए हैं। यह संगठन स्कूली पाठ्यक्रमों का ‘इस्लामीकरण’ चाहता है। बदकिस्मती से हकीकत यही है कि ये कट्टरपंथी संगठन जिन इलाकों में काबिज हैं, वहां के अनगनित बच्चों के भविष्य से ये खिलवाड़ कर रहे हैं। अगर इन संगठनों को उनके अपने हथियारों और अपनी तरकीबों के भरोसे छोड़ दें, तो वे नई नस्लों को कम हुनरमंद और कम पढ़ा-लिखा बना देंगे और मजहब को लेकर उनका नजरिया बेहद संकीर्ण होगा। या फिर यह भी हो सकता है कि हमारे नौजवान निरक्षर रह जाएं। सीरिया कई मोर्चों पर खून-खराबे भरे संघर्ष का सामना कर रहा है और अफगानिस्तान में अभी पूरी तरह शांति और स्थिरता कायम नहीं हुई है। अपनी सीमा से दहशतगर्दों को बाहर करने के लिए नाइजीरिया और पाकिस्तान को बहुत कुछ करना पड़ सकता है या फिर ये मुल्क दहशतगर्दी के कई सारे बुरे अंजामों के अलावा एक ऐसी पीढ़ी को झेलने के लिए तैयार रहे, जिसकी तालीम आधी-अधूरी और गलत हो।   
डॉन, पाकिस्तान

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