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बिचौलियों की बन आई

किसानों को अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचनी ही पड़ती है। आलू का थोक मूल्य आठ से दस रुपये प्रति किलोग्राम होता है। परंतु उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते कीमत पांच से छह गुनी हो जाती है। आजकल बढ़िया किस्म का आलू बाजार में चालीस से पचास रुपये प्रति किलो बिक रहा है। थोक विक्रेता, दलाल, बिचौलिये तथा अन्य जमकर लाभ कमा रहे हैं। गोदामों में माल जमाकर साजिशन थोडम-थोडम निकालना तथा ऊंचे दाम पर बेचना कमाई का जरिया बन गया है। सरकार ने आलू के आयात का जो निर्णय लिया है, वह एक प्रशंसनीय कदम है। प्याज का भी मंडी भाव पांच से आठ रुपये के आसपास होता है, लेकिन उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते इसका मूल्य पैंतीस-चालीस हो जाता है। अच्छा होता कि प्याज का भी आयात किया जाता। आश्चर्य है कि कृषि प्रधान देश में आलू-प्याज जैसी चीजें लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। लगभग बीस साल पहले मैंने मध्य प्रदेश के अंकलेश्वर में प्याज की फसल पर ट्रैक्टर चलते देखा था। पूछने पर पता चला कि पचास पैसे किलो की दर से भी खरीदार नहीं मिल रहे हैं। कुछ साल पहले पंजाब के किसानों ने आलू सडम्क पर फेंक दिए थे, क्योंकि एक रुपया प्रति किलो भी खरीदार नहीं मिल रहा था। एक बार आगरा में भी आलू खेतों में सडम् गया था, कोई खरीदार नहीं था, इसलिए खाद बना दिया गया था।
जसवंत सिंह
 शांतिकुंज, नई दिल्ली 

स्वच्छता का अभियान
दो अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रोत्साहन से स्वच्छता अभियान की शुरुआत हुई। यह अभियान गांधीजी के सिद्धांत को व्यावहारिक रूप देने का प्रयास है। हम आशा करते हैं कि सभी देशवासी इस अभियान में शामिल हुए होंगे। और इस अभियान को राजनीति से इतर देखने की जरूरत है। लेकिन उस दिन तो हमने प्रधानमंत्री की बातों से प्रोत्साहित होकर साफ-सफाई का अभियान चलाया, लेकिन उस दिन के बाद क्या ऐसा किया?  नहीं। मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि वह किसी बात से प्रभावित हो जाता है और कुछ अच्छे कार्य कर दिखाता है, लेकिन फिर से वह अपनी पुरानी स्थिति में वापस आ जाता है। आज जरूरत है कि साफ-सफाई को सहजता से स्वीकार कर स्वभाव बनाने की, ताकि भविष्य में गंदगी का मौका न मिले। सफाई हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है।
जयति गोयल

दिल्ली में किसकी लहर
लौट के बुद्धू घर को आए। यह कहावत भाजपा के लिए एकदम सटीक बैठती नजर आ रही है। नौ महीने के सियासी ड्रामे, गंदी राजनीति और खरीद-फरोख्त में विफल होने के बाद अब भाजपा दिल्ली में चुनाव के लिए राजी हो गई। कोई मजबूत चेहरा न होने के कारण भाजपा दिल्ली में चुनाव कराने से कतराती रही है। यह हवाई बात नहीं हं, बल्कि तथ्यों पर आधारित है। हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा ने जिस सफाई से मोदी लहर को भुनाया और जिस तरह से भाजपा जम्मू-कश्मीर में भी मोदी के सहारे अपनी नैया पार लगाना चाहती है, उसी को देखकर लगता कि भाजपा में मोदी के अलावा और कोई विकल्प मौजूद नहीं।
अनन्य पंडित
 नोएडा, उत्तर प्रदेश

राहुल की राजनीति
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को इन दिनों मुफ्त सलाह देने वालों की कतार लग गई है। उनका न सिर्फ उपहास उडमया जा रहा है, बल्कि कई लोग आपत्तिजनक रूप से हमलावर हो रहे हैं। लोकतंत्र में विरोध होना ही चाहिए, लेकिन विरोध करते हुए हमें इतना तो बरतना ही चाहिए कि विरोध मुद्दों पर और जनहित से संचालित हों। नेहरू-गांधी परिवार पर हमला करने वाले लोग अक्सर व्यक्ितगत हो उठते हैं और राहुल गांधी की क्षमता पर तंज कसने से नहीं चूकते। ऐसा करते हुए वे भूल जाते हैं कि अमेठी की लाखों जनता ने राहुल की राजनीति और नेतृत्व को अपना समर्थन दिया है।
रमेश सिंह, मोतीपुर, बिहार

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