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आखिर किस प्रदेश के निवासी हैं खवासपुर के लोग

गंगा नदी को पार करने और लगभग पांच किलोमीटर पैदल चलने के बाद जब ‘हिन्दुस्तान’ की टीम खवासपुर पहुंची तो वहां के लोगों के लिए यह अजूबा से कम नहीं था। खेत में काम कर रहे परमेश्वर यादव ने हैरत से पूछा- रउवा लोग कहां से ढहत-ढिमिलात पहुंच गईनी। एहिाा त बिहार के कोई ना आवेला। ना सरकारी अफसर आ ना नेता। 18 टोले में बंटे इस गांव तक पहुंचने के लिए न तो कोई सड़क है और ना ही बिजली। गांव के लोगों को अब भी पता नहीं चलता है कि वे बिहार में हैं या उत्तरप्रदेश में। जब सरकारी काम कराना होता है तो वे नदी पार कर आरा चले जाते हैं और बाकी अन्य सभी कार्यो के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश जाना पड़ता है। हालत यह है कि यहां मोबाइल का नेटवर्क भी उत्तर प्रदेश का ही पकड़ता है। उत्तर प्रदेश का बलिया इस गांव से काफी नजदीक पड़ता है।ड्ढr ड्ढr आरा लोकसभा क्षेत्र में पड़ने वाले इस गांव में चुनाव के समय भी कोई प्रत्याशी वोट मांगने नहीं आता है। जबकि गांव में लगभग 15 हाार वोटर हैं। गांव में बूथ बनता है और लोग अपनी इच्छा के अनुसार वोट दे देते हैं। गांव के सुरेश सिंह बताते हैं कि इस चुनाव में भी अब तक किसी पार्टी का कोई नेता यहां प्रचार में नहीं आया है। पिछले चुनाव में कांति सिंह गंगा उस पार से ही हाथ हिलाकर चली गई थीं। नेता ही नहीं पुलिस भी यहां आने से परहेा ही करती है। गांव में एक ओपी है लेकिन बड़ी घटनाओं के बावजूद जिले की पुलिस कई दिनों के बाद आती है। दियारा का गांव होने के कारण यहां गैंगवार में गोलियों का चलना भी आम बात है।ड्ढr ड्ढr बिहार और उत्तर प्रदेश के लफड़े के कारण ही इस गांव में आज तक बिजली नहीं पहुंची है। बिहार सरकार के अधिकारियों को लगता है कि उत्तर प्रदेश से नजदीक होने के कारण इस गांव को वहां से बिजली मिलना आसान होगा और उत्तर प्रदेश इस गांव को बिजली इसलिए नहीं देता कि यह उसकी जिम्मेवारी नहीं है। यहां के लोग दोनों प्रदेशों के अधिकारियों से गुहार लगाते हैं। गांव में अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेन्द्र भी है लेकिन वहां कोई स्वास्थ्यकर्मी नहीं आता। खवासपुर पहुंचना इतना मुश्किल है कि किसी के लिए रो यहां आना संभव भी नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यहां के लोगों के लिए आरा पहुंचना है। घाट के ठेकेदार नाव का मनमाना भाड़ा वसूल करते हैं। अगर जेब में 40 रुपये हों तब तो कोई आदमी गंगा पार कर सकता है। गांव की लड़कियां भी कभी हाई स्कूल से ज्यादा की पढ़ाई नहीं कर पातीं। गांव में हाई स्कूल है लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें बिहार के आरा अथवा उत्तर प्रदेश के बलिया जाना पड़ेगा और यह उनके लिए संभव भी नहीं है। पंचायत समिति सदस्य राजीव यादव बताते हैं कि हाई स्कूल में भी वर्षों से गणित के शिक्षक नहीं हैं। बच्चों ने आपस में चंदा करके एक प्राइवेट शिक्षक को गणित पढ़ाने के लिए गांव में रखा है। बाढ़ के समय तो यह गांव टापू बन जाता है और लोगों का संपर्क बलिया और आरा दोनों से कट जाता है।ं

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