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गांधी परिवार और कांग्रेस का संकट

पिछले हफ्ते एक टेलीविजन प्रोग्राम में तेज-तर्रार एंकर ने मुझसे पूछा कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को मैं क्या सलाह देना चाहूंगा? मुझे संदेह है कि हम 1.2 अरब भारतीयों में शायद ही कुछ ऐसे होंगे, जिनके पास राहुल गांधी को देने के लिए कोई सलाह नहीं होगी। लेकिन इस अचानक सवाल से मैं स्तब्ध रह गया, यह सूझा ही नहीं कि क्या जवाब दूं। मैंने कहा, ‘क्या मैं इस सवाल को टाल सकता हूं?’ लेकिन वह एंकर मुझे इतनी आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी। राहुल गांधी अब क्या करेंगे? पूरा देश उन्हें सलाह दे रहा है। राहुल अगर ओबरॉय होटल के रेस्तरां में खाना खाने जाएं, तो शायद वहां का वेटर भी उन्हें सलाह दे दे। अगर कांग्रेस उपाध्यक्ष अच्छी नीयत वाली इन सलाहों से बचने के लिए खुद को तुगलक लेन के अपने घर में बंद कर लें, तो फिर किसे दोष दिया जाए? ऑस्कर वाइल्ड ने कहा था, ‘अच्छी सलाह के साथ सबसे अच्छा बर्ताव आप यह कर सकते हैं कि उसे नजरंदाज कर दें।’ मुझे लगता है कि राहुल गांधी यही कर रहे हैं।

कांग्रेस के अंदर इस समय ढेर सारी बगावतें दिख रही हैं। एक दिन पी चिदंबरम यह कहते हैं कि राहुल गांधी को मीडिया से ज्यादा बातचीत करनी चाहिए, तो अगले दिन उनके बेटे अनुरोध करते हैं कि राहुल को राज्यों की इकाइयां भंग कर देनी चाहिए। दिग्विजय सिंह तकरीबन हर पखवाड़े कम से कम एक नया विचार जरूर ही देते हैं। जी के वासन ने भी पिछले दिनों एक लेख लिखकर अपने उद्गार व्यक्त किए। राहुल को क्या करना चाहिए, इस पर पिछले दिनों संदीप दीक्षित ने जब कुछ ‘निजी’ विचार दिए, तो केरल के कुछ कांग्रेस नेताओं ने उन्हें पार्टी छोड़ देने का सुझाव ही दे दिया। और हां मैं भूल गया था, महीने में दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करने वाले शशि थरूर का कहना है कि उनके पास बहुत सारे समाधान हैं, बशर्ते कोई उनकी बात सुने।

इसके पहले कि मैं अपनी सोलह आने खरी बात रखूं, मुझे लगता है कि हमें यह समझने से काफी मदद मिलेगी कि इस समय राहुल गांधी के दिमाग में क्या चल रहा है? मुझे लगता है कि वहां भारी संशय और उलझन है। इस समय पार्टी के सामने जो संकट है, उसे लेकर अगर उनकी प्रतिक्रिया तिरस्कार भरी हो या उसमें डराने वाली उदासीनता हो, तो इसे समझा जा सकता है। लोग तो बातें करेंगे ही। लोग अपने-अपने नतीजे भी निकालेंगे। कोई उन्हें ‘अड़ियल राजकुमार’ कहेगा, कोई ‘नकारा वारिस’ कहेगा, तो कोई ‘राजवंश का खात्मा करने वाला।’ लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि क्या मां, बेटी और बेटा हालात की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं? क्या वे यह मानकर बैठे हैं कि ईश्वर की कृपा से नरेंद्र मोदी हटेंगे और सत्ता उनकी झोली में आ जाएगी? निश्चित रूप से वे यह तो समझ ही चुके होंगे कि अब पार्टी को एक दशक या इससे भी ज्यादा समय के लिए विपक्ष में बैठने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

उन्हें यह आशंका भी दिख रही होगी कि जिसे द इकोनॉमिस्ट ने ‘आधुनिक दौर का सबसे सफल राजवंश’ कहा था, उसके अंतिम क्रिया-कलाप का ठप्पा उनके माथे पर लग सकता है। परिवार जानता है कि वह ऐसे बम पर बैठा है, जिसके पलीते में आग लग चुकी है। रहस्य यह है कि वह इस बम से उतर क्यों नहीं रहा? मैं नहीं कह सकता कि मेरे पास इसका जवाब है, लेकिन हम इसे समझने की कोशिश जरूर कर सकते हैं। प्रियंका गांधी की समस्या उनके पति से जुड़ी है, सोनिया गांधी का स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा और वह अपने बेटे के राजतिलक के लिए बेचैन हैं। अब इस परिवार के पास खेलने के लिए सिर्फ एक पत्ता है। यह पत्ता अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है, आप इसे जोकर भी कह सकते हैं, लेकिन अब उनके पास राहुल गांधी ही अकेला पत्ता हैं। पार्टी के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं।

सोनिया गांधी नहीं चाहतीं कि प्रियंका पूरी तरह राजनीति में उतरें, वह उन्हें उत्तर प्रदेश में परिवार के गढ़ तक सीमित रखना चाहती हैं। इसलिए राहुल ही हैं, जो अकेले खेवनहार हैं। अब हम राहुल को भी समझने की कोशिश करें, मई 2014 से वह राष्ट्रीय मनोरंजन का विषय बन चुके हैं। उन्हें नाकाम मानने पर आम सहमति है और इस पर कोई चर्चा भी नहीं करना चाहता। वह इतनी बड़ी नाकामी कैसे बन गए, इसकी जांच करना बहुत दिलचस्प होगा। आखिरकार, वह प्रखर हैं, पढ़े-लिखे हैं, समझदार हैं, तर्क यह भी दिया जा सकता है कि वह हमारे ज्यादातर शासकों से कहीं ज्यादा योग्य हैं। बदकिस्मती से राजवंश का यह वारिस जब से सांसद बना और बाद में पार्टी का उपाध्यक्ष बना, उसे नाकामी के अलावा कुछ और मिला ही नहीं। अगर कोई आयरिश नाट्य लेखक सैमुअल बेकेट की बात को माने, तो नाकामी उसकी स्थायी किस्मत नहीं हो सकती।

बेकेट ने कहा था, ‘नाकाम होते जाएं, अगली बार नाकामी पहले से बेहतर हो।’ फिर राहुल कामचोर भी नहीं हैं। पिछले दस साल से वह कमर कसे हुए हैं। कभी पुलिस से बचने के लिए मोटरसाइकिल पर बैठकर जाते हैं, तो कभी किसी दलित के घर रात बिताते हैं। धूल-धक्कड़ और गरमी में उन्होंने मेहतन तो की ही है। लेकिन 2009 की छोटी-सी जीत को छोड़ दें, तो उनके नेतृत्व में पार्टी को चुनावी मात ही मिली है। 2012 के उस उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को कौन भूल सकता है, जब राहुल ने मीडिया के सामने हार की पूरी जिम्मेदारी स्वीकार की थी? और जब वह पत्रकारों से बात करके जा रहे थे, तो प्रियंका उन्हें सांत्वना दे रही थीं। यह एक ऐसा क्षण था, जब राजनीति मानवीय दिखने लगती है।

अब जब कांग्रेस का भविष्य अंधकारमय दिख रहा है, तो उसके सामने दो विकल्प हैं। पहला यह कि किसी दैवीय शक्ति की कृपा से राहुल के नेतृत्व में चमक आ जाए, और वह ऐसे प्रेरणाप्रद सेनापति बन जाएं, जो अपनी निराश फौज को जीत की ओर ले जाए। अगर मौजूदा हालात बने रहे, तो भारत की यह सबसे पुरानी पार्टी अपना मतलब खो देगी। दूसरा यह हो सकता है कि कांग्रेस परिवार से नाता तोड़ ले। पार्टी के कई लोगों को यह बात सोचकर ही दिल का दौरा पड़ सकता है। अफसोस, अब वह समय आ गया है कि इस पर भी सोचा जाए। क्या इस परिवार के आगे कांग्रेस का कोई भविष्य है? इस संभावना में बहुत सारी आशंकाएं हैं। उसे जोड़ने वाला गांधी परिवार वहां नहीं रहा, तो क्या पार्टी को टूटने से बचाया जा सकेगा? अगर आप इसका जवाब दे सकते हैं, तो बेशक आपको राजनीति का नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:गांधी परिवार और कांग्रेस का संकट