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भाजपा बदल रही है अपनी कश्मीर नीति

क्या कश्मीर घाटी के पूर्व अलगाववादी नेता सज्जाद लोन की प्रधानमंत्री से मुलाकात को एक सामान्य शिष्टाचार मुलाकात की तरह देखा जा सकता है? एक ऐसा नेता, जिसका भाजपा हमेशा ही विरोध करती रही हो, वह आसानी से प्रधानमंत्री से मिल ले और मिलने के बाद उनकी प्रशंसा के पुल बांधे, तो इसके कुछ निहितार्थ तो हैं ही। लोन ने मोदी के विनम्र स्वभाव की प्रशंसा की और उन्हें जमीन से जुड़ा व्यक्ति बताया। ये बयान सामान्य नहीं हैं, खासकर चुनाव के माहौल में और कश्मीर के भविष्य के लिए। सज्जाद गनी लोन पहले अलगाववादी समूह में थे। मगर अपने पिता व जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेता अब्दुल गनी लोन की हत्या के बाद उनका विचार बदलने लगा था। उन्होंने हत्या का आरोप पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई पर मढ़ा था व एक हुर्रियत नेता की मिलीभगत भी बताई थी। फिर वह कश्मीर घाटी की मुख्यधारा की राजनीति में आ गए। उन्होंने लोकसभा चुनाव में बारामूला से चुनाव लड़ा, मगर हार गए। चुनाव के समय कोई भी इसका पहला निष्कर्ष यही निकालेगा कि या तो चुनाव पूर्व गठबंधन की बात हो रही है या बाद की संभावना बनाई जा रही है। नरेंद्र मोदी से मिलने से पहले लोन ने भाजपा महासचिव राम माधव से भी मुलाकात की थी। इसके पहले जुलाई में भाजपा के महासचिव और अब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और लोन की मुलाकात हुई थी। यानी यह अचानक घटी घटना नहीं है।

कश्मीर में यह खबर पहले से गरम थी कि भाजपा और सज्जाद लोन के नेतृत्व वाली पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के बीच चुनावी तालमेल हो सकता है। लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस का कुपवाड़ा जिले की पांच विधानसभा सीटों पर प्रभाव है। लेकिन पीपुल्स कॉन्फ्रेंस जब 18 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार चुकी है, तो तालमेल कहां होगा? फिलहाल यह दिख रहा है कि भाजपा कश्मीर में नई रणनीति अपना रही है। बकरवाल और गुर्जर समुदाय के लोग पिछले कुछ महीनों में दिल्ली में प्रधानमंत्री से मिल चुके हैं। शिया समुदाय को भी लुभाने की कोशिश पार्टी कर रही है। घाटी छोड़ चुके कश्मीरी पंडितों के नाम मतदाता सूची में डलवाने के लिए अलग समिति बनाई गई है। संभव है कि भाजपा अलगाववाद की धारा से बाहर आए किसी नेता को वहां उभारना चाहती हो, ताकि नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के साथ हुर्रियत के प्रभाव को कम किया जाए। घाटी के वोट बहिष्कार में न जाएं, बल्कि तीन भागों में बंटे। जितना यह बंटेगा, भाजपा को उतना ही लाभ होगा। लोन को भी इसमें लाभ है। यह लंबे समय बाद हुआ कि जब कश्मीर घाटी का कोई नेता कह रहा है कि उसने प्रधानमंत्री से ये मांगें कीं, जिन्हें उन्होंने स्वीकार किया। अगर सज्जाद लोन की पार्टी कुछ भी सीटें ले आती है और भाजपा सरकार बनाने के करीब पहुंचती है, तो यह जम्मू-कश्मीर की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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