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काम की कीमत

कामयाबी के पीछे कई वजहें होती हैं। जो सबसे बड़ी है, वह है छोटे से छोटे काम को लेकर सम्मान भाव। ऐसा मानना है वनिता नारायणन का। वनिता बड़ी कॉरपोरेट हस्ती हैं। उनके पास आईबीएम जैसी कंपनी का शीर्ष पद भी रहा है। वह कहती हैं, मैं अपनी रसोई में खाना बनाने, पोंछा लगाने, कपड़े धोने में खुद को उतना ही सम्मानित महसूस करती हूं, जितना अपने दफ्तर के कंप्यूटर के आगे बैठ काम निपटाने में। जिनके लिए काम का वजूद बस काम की तरह होता है, वही असली कामगार होते हैं। उनके लिए कोई काम बड़ा या छोटा नहीं होता। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉनसन ने गरमियों की छुट्टियों में पैसे कमाने के लिए महज नौ साल की उम्र में जूतों की पॉलिश की थी। कपास के खेतों में भी काम किया था। वह बस चालक बने और वेटर का भी काम उन्होंने संभाला। वह कहते थे कि इन कामों में और राष्ट्रपति बनने के बाद किए गए काम में उनके लिए कोई फर्क नहीं था।

लक्ष्य सभी कामों के लिए एक था- परफेक्शन के साथ उसे निभाना। काम चाहे जो भी हो, उससे प्यार करना हमारे व्यक्तित्व निर्माण का बड़ा हिस्सा है। मनोवैज्ञानिक चाल्र्स स्पीलबर्गर कहते हैं कि हर काम को इज्जत बख्शने वाले लोग ज्यादा शालीन, ज्यादा विनम्र होते हैं। जो माता-पिता अपने बच्चों से उनसे जुड़े सारे काम खुद करने को कहते हैं, उनमें इंस्टेंट ग्रेटिफिक्शन यानी तुरंत इच्छापूर्ति की समस्या नहीं होती। वे मेहनत और उसके परिणाम को बेहतर तरीके से समझते हैं। ऐसा ही कुछ सोचकर नारायण मूर्ति ने अपने बेटे को इंफोसिस में सबसे छोटे पदों में से एक की कमान सौंपी, ताकि वह सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़े। यही सोच अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन की रही। उन्होंने सर्कस में काम किया, लाइफगार्ड का काम करते हुए 77 लोगों को डूबने से बचाया, लेडीज कैफेटेरिया में टेबल साफ करने की ड्यूटी संभाली। ये चंद उदाहरण भर हैं, दुनिया ऐसे लोगों से भरी पड़ी है।

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