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सामाजिक मोर्चे पर आजादी

बहुत-सी ख्वाहिशें पूरी कीं। कुछ की कोशिश अभी बाकी है। एक ऐसी है कम्बख्त, जिसकी न कोशिश कर सकती हूं, न कभी पूरी ही होगी। पतनशील इच्छा है न! वैसे पतनशील इच्छाएं व्यक्तिगत कीमत पर पूरी की ही जा सकती हैं, पर मेरी चिंता अपनी अकेले की नहीं है। सुबह-सुबह कॉलेज पहुंची, तो मैदान में खेलकर लड़के शर्ट उतार पाइप से नहा रहे थे। मैच जीतने पर खुशी जाहिर करने के लिए गांगुली ने अपनी टी-शर्ट उतार फेंकी थी। रंग दे बसंती के पोस्टर देख लगता था कि दोस्ती और मुक्ति के आनंद की सार्वजनिक अभिव्यक्ति का यह अंदाज चिढ़ाता है मुझे, स्त्री को उसकी सीमाएं दिखाता हुआ-सा! जहां ट्यूबवैल या पानी मिले, वहां नहाना शुरू कर देना, यह सार्वजनिक स्नान दुनिया को अभद्रता क्यों नहीं लगता? श्लील-अश्लील तय करने वाले पैमाने बाकी मानकों की तरह ही स्त्री-पुरुष के लिए अलग हैं।

एक के लिए अश्लीलता स्वाभाविक और एक के लिए गुनाह है। धर्म, समाज, राज्य, कानून पुरुष की ओर हैं। यह किसी पूर्वाग्रह से नहीं कहती, बल्कि इसलिए कहती हूं कि स्त्री कमरे के भीतर स्वयं को कितना भी मुक्त मान ले, किंतु जिन सड़कों पर वह चलती है, जिन दफ्तरों में वह काम करती है, जिस पार्क में बच्चों को खेलने के लिए ले जाती है, जिस खेत में निराई करती है..वे उसकी आजादी और आजाद खयाली को बेमानी कर देते हैं। इसलिए स्त्री की स्वतंत्रता सामाजिक रूप से ही हासिल की जाने की चीज है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसी चीज एक भ्रम है।
चोखेर बाली में सुजाता

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