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पूर्व में सक्रियता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दस दिनों की म्यांमार, फिजी और ऑस्ट्रेलिया यात्रा से उनकी ‘ऐक्ट ईस्ट’ नीति को ज्यादा स्पष्ट करने का मौका मिलेगा। म्यांमार में आसियान, भारत और पूर्वी एशियाई देशों के शिखर सम्मेलन हैं और ऑस्ट्रेलिया में जी-20 देशों का शिखर सम्मेलन है, जिनमें प्रधानमंत्री कई देशों के नेताओं से व्यक्तिगत मुलाकात करेंगे। लगभग 25 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने ‘लुक ईस्ट’ की नीति का सूत्रपात किया था। यह इसलिए जरूरी था कि भारतीय राजनय की नजर परंपरागत रूप से पश्चिम की ओर रही है। अमेरिका, रूस, यूरोप और पश्चिम एशिया के देशों पर ही हमारी विदेश नीति का ध्यान रहा है। नरसिंह राव ने यह महसूस किया कि पूर्व के देशों की ओर ध्यान देने और उनसे संबंध बेहतर बनाने के कई फायदे हैं। मुख्य बात यह है कि भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से हम पूर्वी एशिया के ज्यादा करीब हैं। इनमें से कई आर्थिक रूप से काफी विकसित देश हैं और उनसे रिश्ते हमारे आर्थिक हितों के लिए भी जरूरी है। इसके अलावा कई महत्वपूर्ण जलमार्ग इस क्षेत्र में हैं, जो हमारी व्यापारिक और सामरिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।

हिंद महासागर क्षेत्र का सबसे बड़ा देश होने के नाते भारत पर यह जिम्मेदारी भी है कि इस क्षेत्र में स्थिरता और शांति बनाए रखे और यह काम पूर्वी देशों से सहयोग के जरिये ही संभव है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद इस नीति में ज्यादा सक्रियता की जरूरत महसूस की है, इसलिए उन्होंने ‘लुक’ को ‘ऐक्ट’ कर दिया है। मोदी की इस नीति का नतीजा यह है कि सबसे पहले जिन दो देशों से संबंधों में ज्यादा सक्रियता आई है, वे जापान और वियतनाम हैं। इन देशों के रिश्ते चीन के साथ अच्छे नहीं हैं। नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा और वियतनामी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा से यह संदेश विश्व जनमत को दिया गया कि इस इलाके में भारत चीन के समानांतर धुरी बनने को तैयार है। चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी वियतनाम की यात्रा पर थे और वहां समुद्र से तेल निकालने के लिए भारत और वियतनाम के बीच समझौतों पर दस्तखत किए गए। यह उत्खनन उस समुद्री क्षेत्र में हो रहा है, जिस पर चीन अपना दावा जताता है।

इस तरह भारत ने यह साफ कर दिया कि वह एक सीमा से आगे चीन की परवाह नहीं करता। वियतनाम से रक्षा समझौता करके भारत ने नई सक्रियता दिखाई थी। परंपरागत रूप से इस क्षेत्र में भारतीय नीति के पीछे यह हिचकिचाहट रही है कि चीन से रिश्तों में ज्यादा कड़वाहट न आए। मोदी की नीति में यह हिचकिचाहट नहीं है। वह यह संदेश देना चाहते हैं कि भारत ज्यादा बड़ी भूमिका निभाने को तैयार है। यह उम्मीद की जा सकती है कि इस यात्रा में इस नीति का अगला कदम देखने में आएगा। एक कोशिश यह हो रही है कि इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक देश भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और वियतनाम अपने व्यापारिक और सामरिक हितों की रक्षा के लिए साझा कार्यक्रम बनाएं, ताकि चीन के बढ़ते दबाव का मुकाबला किया जा सके। ऑस्ट्रेलिया में इस विषय पर बात जरूर होगी।

ब्रिस्बेन में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने भारतीय प्रधानमंत्री के लिए रात्रिभोज का आयोजन किया है, इससे यह तो पता चलता ही है कि जापान के लिए भारत की मैत्री कितनी महत्वपूर्ण है। म्यांमार का भारतीय विदेश नीति में विशेष महत्व है और वहां मोदी की मुलाकात पूर्वी एशिया के कई राजप्रमुखों से होगी। यह सक्रियता भारत के तत्काल और भावी हितों के लिए तो जरूरी है ही, इस क्षेत्र के देश भी इस भारतीय नीति से निश्चित रूप से खुश होंगे।

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