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महिलाओं के सपनों को नई उड़ान मिलेगी

महिलाओं के सपनों को नई उड़ान मिलेगी

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से न केवल सैकड़ों महिला मेकअप आर्टिस्टों को फिल्म इंडस्ट्री में रोजी-रोटी कमाने का एक सुनहरा मौका मिलने जा रहा है बल्कि मुझे इस बात की खुशी है कि अब ऐसी महिलाओं के सपनों को एक नई उड़ान भी मिलेगी।

मैं वह दिन कभी नहीं भूलती जब मुंबई में फिल्म स्टूडियो के बाहर बड़े-बड़े सितारों की वैनिटी वैन के सामने मैं बेबस खड़ी निहारती रहती थी। सोचती थी कि कब इन सितारों का मेकअप करने का मौका मिलेगा। मेरे पास हुनर था, अनुभव था, विश्व के सबसे बेहतरीन संस्थान की डिग्री थी, लेकिन इन सब के बावजूद मैं फिल्म सितारों पर अपने हुनर का जादू दिखा सकती थी। मैं उनके बाल संवार सकती थी, लेकिन कानूनी अड़चन की वजह से मैं उनका मेकअप नहीं कर सकती थी। कानून मुझे इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। मुझे 1955 के उस कानून का सामना करना पड़ रहा था, जो कहता है कि फिल्म इंडस्ट्री में केवल पुरुष मेकअप आर्टिस्ट ही सितारों का मेकअप कर सकते हैं।

मैं हमेशा सोचती कि साज-श्रृंगार तो महिलाओं से जाना जाता है। तो फिर उन्हें इस क्षेत्र में काम क्यों नहीं करने दिया जा रहा है। फैशन-ग्लैमर जैसी इंडस्ट्री में हम महिलाएं क्यों कुछ बड़ा नहीं कर सकतीं। मैं क्यों किसी फिल्म स्टार का मेकअप नहीं कर सकती। ये सवाल मन में लिए मैंने वकील ज्योतिका कालरा की मदद से अदालत का दरवाजा खटखटाया। हमें ये लड़ाई लड़ने में कई मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा। पर अंतत: हमारी जीत हुई। उन महिला मेकअप आर्टिस्टों की जीत हुई, जिनके सपने-उम्मीदें इस कानून की वजह से कहीं दब गए थे।

इस फैसले से मेरी मां नीलम खुराना की जीत हुई, जिनके हुनर को मैंने कभी अपनाया था। 13 साल पहले 250 रुपये से अपनी जिंदगी शुरू की थी। बाद में मैं लास एंजेलिस के सिनेमा स्कूल ऑफ मेकअप पहुंची। जब उस एक साल के कोर्स पर 32 लाख रुपये खर्च हो गए तो मुझे लगा कि घर को संभालने के लिए मुझे कुछ बड़े फैसले लेने होंगे। शादी की भी उम्र (32 वर्ष) हो रही थी। पर जब मुंबई पहुंचकर निराशा हाथ लगी तो वहीं से लड़ने की शक्ति भी मिली। 
(विशाल ठाकुर से बातचीत पर आधारित)

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