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टिकी है गिद्ध की नजर

कहा जाता है गिद्ध की नजर तेज होती है। आकाश में उड़ते हुए जमीन पर शिकार को झपट्टा मार कर पकड़ लेता है। देश में भले ही गिद्ध कम हो गए हों, लेकिन गिद्ध वाली नजर की कमी नहीं है। खास कर इन दिनों चुनाव में राजनीतिक दलों की नजर कुछ इसी तरह की है। अपनी-अपनी पार्टी से नाराज चल रहे नेताओं पर दूसरे दलों ने पैनी निगाह रखी है। चुनाव घोषणा के बाद से अब तक दो दर्जन नेता इधर-उधर हो चुके हैं।

किस पाले में कौन:
गत कुछ दिनों में इतने बदलाव हुए हैं कि कौन नेता किस दल में गया, इसे याद करने की जरूरत पड़ जाती है। एक राष्ट्रीय दल के नेता ने तो टिकट फाइनल होने और सिंबल लेने के एन वक्त पार्टी को बॉय-बॉय बोल दिया। एक क्षेत्रीय दल के नेता पार्टी से उम्मीदवारी घोषित होने के बाद दूसरे दल में जाने की तैयारी में हैं, तो तीसरे ने नाम घोषणा के बाद चुनाव लड़ने से ही मना कर दिया। पार्टी प्रमुख की ऐसे नेताओं पर गिद्ध भरी नजर टिकी है।

जहां माल, वहां काम:
चुनाव में कार्यकर्ताओं की भूमिका अहम होती है। पार्टी नेता उन्हें रीढ़ और अन्य कई तरह के संबोधन से नवाजते रहते हैं। चुनावी मौसम में उनकी पूछ अधिक बढम् गई है। एक राजनीतिक दल के पार्टी कार्यालय के बाहर कार्यकर्ताओं की हंसी-ठिटोली चल रही थी। एक कार्यकर्ता ने खूब कहा-जब नेता टिकट के लिए पाला बदल सकते, तो हम पैसे के लिए चुनाव के समय दूसरे दल के लिए काम क्यों नहीं कर सकते। जो अधिक माल खर्च करेगा, उसी के साथ हो लेंगे।

जनता भी ले रही चुटकी:
ऐसा नहीं कि इन बातों पर जनता की नजर नहीं है। उनकी नजर भी है और वह चुटकी भी ले रहे हैं। सुबह चाय की दुकान पर एक क्षेत्रीय दल के कुछ कार्यकर्ता पहुंचे। दुकानदार ने छूटते ही पूछा ‘भैया आज कल किसके पाले में हो। किसी दूसरे दल के लिए तो काम शुरू नहीं कर दिया। कहीं दूसरी जगह जाने पर विचार तो नहीं कर रहे।’ यह जनता के भाव हैं। खैर जय हो ऐसे दल-बदलुओं की, जिनकी निष्ठा फायदे-नुकसान पर टिकी है।

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