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शिवसेना के लिए यह अच्छी स्थिति है

आज महाराष्ट्र की राजनीति जिस चौरस्ते पर खड़ी है, उसमें शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे से बड़ी हस्ती कोई दूसरी नहीं है। राज ठाकरे तो नेपथ्य में भी कहीं नहीं हैं, न कहीं हैं पृथ्वीराज चव्हाण और न शरद पवार का कुनबा। देवेंद्र फडणवीस हैं, तो इसलिए कि वह मुख्यमंत्री बन बैठे हैं और उनके पीछे नरेंद्र मोदी की आभा है। जहां कहीं भी होंगे शिवसेना के जन्मदाता बाला साहेब ठाकरे, वह अपने बेटे उद्धव ठाकरे की इस भूमिका से गद्गद होंगे। वह भी तब, जब यह माना जा रहा था कि भारतीय जनता पार्टी से वह राजनीतिक बाजी हार गए हैं। विधानसभा में तो शिवसेना को भाजपा के मुकाबले बहुत कम सीटें मिली ही थीं। इसके बावजूद उद्धव ठाकरे ने जो कर दिखाया, उसकी कुछ समय पहले तक किसी को उम्मीद भी नहीं थी। माना तो यह जा रहा था कि अपनी यह सारी विरासत बाला साहेब ने भतीजे राज ठाकरे को सौंप दी और राज बेटे उद्धव को। अपने 63 विधायकों को लेकर अलग खड़े उद्धव, नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के 123 विधायकों की बड़ी जीत को इस तरह बेरंग कर देंगे, यह किसने सोचा था? स्थिति ऐसी है कि सभी ठिठके हुए हैं और ऐसा लग रहा है कि जैसे शिवसेना लगातार पत्ते फेंकती जा रही है।

वह अनिश्चय में नहीं है, निश्चय करने से पहले पानी की थाह ले रही है। उद्धव को लग रहा है कि नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी से बदला लेने का यही पल है, कल वह पल नहीं रहेगा। नरेंद्र मोदी भी और भारतीय जनता पार्टी भी यह खूब समझ रहे हैं कि वे केंद्र में भी और राज्य में भी शान के साथ तभी रह सकते हैं, जब महाराष्ट्र में भी और देश में भी वे शिवसेना के साथ दिखाई दें। शिवसेना का साथ टूटना मतलब हिंदुत्व का एक दूसरा दावेदार पैदा करना भी हो सकता है और भाजपा गठबंधन के दूसरे भागीदारों के मन में शंका पैदा कर देना भी। इसका दूसरा मतलब मुंबई महानगरपालिका का, जो अपने आप में भारत के कई राज्यों से बड़ा बजट रखती है, हाथ से जाना, महाराष्ट्र की कई नगरपालिकाओं में कमजोर पड़ जाना और मराठी मानुस का स्वाभाविक समर्थन खो देना भर नहीं है, बल्कि यह भरोसा भी खो देना है कि नरेंद्र मोदी के तरकश में कई-कई तीर हैं।

इसलिए शिवसेना उसे अटका रही है। शायद नरेंद्र मोदी भी और अमित शाह भी यह समझ रहे होंगे कि सदन में बहुमत का एक मतलब होता है, लेकिन वह आखिरी चीज नहीं है। बहुमत को सहारा देने वाले हाथों का मतलब बहुत ज्यादा होता है। यही जानने के कारण अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी सरकार सबके समर्थन से चलाई और मनमोहन सिंह सबके समर्थन से सरकार भी न चला सके और न खुद चल सके। शिवसेना को महाराष्ट्र की राजनीति से आप अभी-के-अभी तो बाहर नहीं कर सकते हैं। उसके पास बहुत बड़ी सेना है, उसके पास मजबूती से साथ खड़े 63 विधायक हैं और एक बड़ा चपल सेनापति है, जिसके पास अभी काफी वक्त है। उसे पता है कि यदि उसे राजनीतिक सबक सिखाने के जोखिम में भारतीय जनता पार्टी ने शरद पवार कुनबे से हाथ मिला लिया, तो वह धृतराष्ट्र-आलिंगन भी साबित हो सकता। अगर भारतीय जनता पार्टी ने ऐसा नहीं किया, तो शिवसेना का कोई विकल्प उसके पास नहीं है।

आज हो या कल, भाजपा के लिए शिवसेना के साथ ही आगे का रास्ता खुलता है। शिवसेना ने चुनाव से पहले ही बता दिया था कि इस बार उद्धव मुख्यमंत्री बनेंगे और भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनाएंगे। यह संदेश नहीं, घोषणा थी। इसलिए 151 से वह 150 सीटें कबूल करने को तैयार नहीं थी। दूसरी तरफ, भाजपा की रणनीति यह थी कि गठबंधन की भावुकता और आदमकद मोदी का भय अंतत: शिव सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर देगा। वह अपने लिए सहयोगियों का वास्ता देकर उतनी सीटें मांग रही थी कि शिवसेना को लगातार दबाव में रख सके। शिवसेना ने समझ लिया कि आगे का रास्ता, गठबंधन का रास्ता बंद करने से ही खुलेगा। यह खतरा था, जो उद्धव की राजनीति का हिस्सा नहीं था। लेकिन बेटे के भीतर से बाप ने जन्म लिया और उद्धव बाल ठाकरेनुमा तेवर से राजनीति का संचालन करने लगे। यह तो भला हुआ कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री होने की झिझक छोड़ी और चुनाव मैदान में कूद पड़े। अभी हवा ऐसी है कि मोदी भाजपा के लिए तुरुप का पत्ता हैं। यह तुरुप का पत्ता विधानसभा चुनाव में भाजपा के काम आया।

अब आगे क्या हो सकता है? भाजपा, शिवसेना को संतुष्ट करने वाली व्यवस्था कबूल कर ले, क्योंकि अब उद्धव को मुख्यमंत्री नहीं बनना है। विधानसभा का गणित उनके पक्ष में नहीं है। अब वह शिवसेना के सर्वेसर्वा नेता बने रहेंगे और उसी हैसियत से सीधे मोदी से बात करेंगे। शायद, उनके मंत्री महाराष्ट्र में भी और दिल्ली में भी सरकार में रहेंगे, लेकिन कुछ वैसी ही भूमिका में, जैसी भूमिका में बाला साहेब ने अटलजी को रखा था। यह राजनीतिक सच्चाई तो अपनी जगह है ही कि न उद्धव बाला साहेब ठाकरे हैं और न मोदी अटल बिहारी हैं। इसलिए समीकरण कुछ अलग रहेगा, लेकिन नरेंद्र मोदी को अपनी छवि से नीचे उतर कर नई रणनीति अपनानी पड़ेगी। दूसरी स्थिति यह बनती है कि शिवसेना महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष की नेता होगी और कांग्रेस व शरद पवार कुनबे को लेकर सरकार का जीना मुहाल किए रहेगी।

कांग्रेस और शरद पवार इससे बेहतर भूमिका की कल्पना भी नहीं कर सकते, क्योंकि यह उसे राजनीतिक बियाबान से बहार में खींच लाने सरीखा होगा। शिवसेना का कौन-सा रूप चाहिए, यह अब मोदी और भारतीय जनता पार्टी को चुनना है। देर शाम की खबर के अनुसार, शिवसेना ने विपक्ष में बैठने का फैसला कर लिया है। शिवसेना की किस्मत देखिए कि वह जीत के निकट भी नहीं पहुंच सकी, लेकिन जीत का मजा ले रही है। न हवा उसके खिलाफ है और न समय उसके पास कम है। उसने गेंद मोदी के पाले में डाल दी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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