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व्यथा गाथा बोर से सराबोर होने की

सूनी सड़क निहारते ताऊ  से पूछ बैठा, ‘ताऊ, दिन भर क्या करते हो?’ ताऊ  कुछ दिन पहले तक दफ्तर नामक किसी स्थान पर ‘खाली’ वक्त काटा करते थे। पड़ोसी का अपनत्व दिखाते, जिज्ञासा दोहराई मैंने- आप दिन भर क्या करते हो? सुबह से बोर हो रहा हूं- थका सा जवाब मिला। उम्र के चौथेपन में जब गीता भागवत पढ़ भक्ति-भाव में सराबोर रहना चाहिए, ताऊ अंग्रेजी में बोर व हिंदी में ऊब रहे थे। एक बोरियत से दूसरी बोरियत में फुदकना उनकी दिनचर्या थी। अखबार में नित एक-सी खबरों की बोरियत से शुरू हुआ उनका दिन, रात के टीवी चैनलों पर अखंड बोरियत वाली बहसों तक चलता। ब्रह्म में लीन की भांति ‘बोरोलीन’ की गति प्राप्त थे वह।
ऐसा नहीं कि ताऊ  पहले कभी बोर नहीं हुए हों। बोर भी हुए प्रतिबोरित भी किया। पढ़ाई के दिनों में हर शेष, महेश, गनेश को बोर करना उनका शगल था।

किसी लल्लू को जब वह बोर करते, तो वह अपनी बोरियत जगधर को पास-ऑन कर देता। एक बार एक मेधावी टाइप बोर ने उनको ललकारा, ‘जितना गहरा बोर करोगे, उतना मीठा पानी निकलेगा।’ उस दिन महाबोर की गति को प्राप्त हो गए थे ताऊ। साहित्य, संगीत, कला लगभग सभी विधाओं से बोर हो चुके थे वह। केबीसी और कपिल की कॉमेडी तक से पर्याप्त बोर हो चुके थे वह। जहां से भी उठते, बोर होकर उठते। सार्थक रूप से बोर होने की कामना उनको कवि-सम्मेलनों में घसीट ले जाती। बावजूद इसके ताऊ को संतोष इस बात का कि वह अकेले बोर नहीं हो रहे हैं। बोरियत के बोरों से भरा है संसार। काले धन की खबरों, दिल्ली के चुनाव, कांग्रेस के नेतृत्व, स्वच्छ अभियान की नित नई तस्वीरों, सौ करोड़ कमाती फिल्मों की रपट से सभी बोर हो रहे हैं, जिसका कौनों साइकोलाजिस्ट के पास निदान नहीं। ताऊ  को इससे अलग अपनी चिंता है। सिर पर सर्दी सवार है। आने वाले दिनों में पहले कोहरा बोर करेगा। फिर सूनी दोपहरिया अपने तरीके से बोर करेगी। इस अखंड बोरियत और ऊब का एहसास पढ़ने वालों को भी बोर कर चुका होगा। यही तो सिद्ध करना चाहते थे ताऊ।

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  • Web Title:व्यथा गाथा बोर से सराबोर होने की