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विवादों के द्वीप

चीन और जापान के बीच बीते दो वर्षों में बढ़ते तनाव के कारण एशिया का माहौल बिगड़ा हुआ था। यह चिंता बढ़ गई थी कि इन दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सैन्य टकराव की स्थिति आ सकती है। लेकिन बीते शुक्रवार को दोनों देशों के नेताओं ने अनूठे राज-काज का परिचय दिया। दोनों उस समझौते की तरफ बढ़े, जिससे तनाव दूर हो सकता है। दोनों तरफ से एक ही तरह का बयान जारी किया गया। चीन व जापान का पूर्व चीन सागर के विवादित द्वीपों पर अपना-अपना दावा  है, मगर यह कहा गया कि अभी कोई पक्ष जीता या हारा नहीं है। इस बीच, उन्होंने कूटनीतिक और रक्षा वार्ताओं के दरवाजे खोल दिए, जो साल 2012 से बंद थे। दरअसल, विवादित द्वीप-समूह को जापानी सेनकाकू कहकर पुकारते थे और चीनी दिओयू बताते थे। इसके बाद चीन ने आक्रामक तरीके से उन द्वीपों को अपना बताया और उस इलाके में अपने जहाज भेजे।

यही नहीं, पूर्वी चीन सागर के ऊपर जापानी एयरक्राफ्ट और चीनी जेट मंडराने लगे। अगर कूटनीतिक भाषा के इस्तेमाल पर गौर करें, तो बयान बताता है कि इस मुद्दे पर ‘अलग-अलग दृष्टिकोण रहेंगे’, फिर भी दोनों देश साथ चलेंगे। यह समझौता दोनों देशों के हितों के हिसाब से ठीक है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे, दोनों के लिए यह सही है। शी एशियन-पैसिफिक इकोनॉमिक ग्रुप समिट के मेजबान हैं और वह इस कार्यक्रम को शांतिपूर्वक संपन्न होते देखना चाहते हैं। उन्हें यह एहसास हो चुका है कि इस खींचतान से दूसरे देशों की चिंताएं भी बढ़ेंगी और वे अमेरिका के करीब जा सकते हैं। उन्हें यह भी मालूम है कि चीन में जापानी निवेश इस साल पहले के मुकाबले आधा रहा है। बीजिंग में अबे भी शी जिनपिंग से मिलने को उत्सुक दिखे। चीन के साथ तनाव बढ़ाने के उनके इरादे से यह पूरा क्षेत्र परेशान था और ऐसे में, ओबामा प्रशासन का दबाव था कि किसी तरह यह तनाव कम हो। हालांकि, दोनों के बीच की बुनियादी समस्याएं अब भी अनसुलझी हैं, क्योंकि ये प्रतिबद्धताएं शिखर बैठक के समापन के साथ ही भुलाई जा सकती हैं।
द न्यूयॉर्क टाइम्स, अमेरिका

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