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ताकि बचपन गुम न हो

बचपन जीवन की ऐसी अवस्था है, जहां स्वतंत्र और तनाव रहित जीवन तथा खेल-कूद संग कुछ सीखने की उम्मीद रहती है। परंतु भारत जैसे देश में, जहां एक बड़ा वर्ग गरीबी में जीवन-यापन कर रहा है, उस वर्ग के बच्चे या तो जबरन या अपनी इच्छा से मजदूरी करने को मजबूर होते हैं। जिन हाथों में कलम और जिन पर देश के भविष्य का भार होना चाहिए, उन्हीं बच्चों को कार्यस्थलों पर काम के बोझ तले हम दबा पाते हैं, तो आत्मग्लानि होती है। हालांकि, भारत सरकार ने बाल-श्रम रोकने की दिशा में काफी प्रयास किए हैं। इस संबंध में न सिर्फ कानून बनाए गए, बल्कि सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा कई जागरूकतापूर्ण कार्यक्रमों का संचालन भी किया गया। इसके बावजूद आज होटलों व ईंट-भट्ठों में 14 साल से कम उम्र के बच्चे काम करते दिखाई देते हैं। उन लोगों की मानसिकता पर तरस आती है, जो अपना बचपन गंवाने के बाद दूसरों के बचपन छिनने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। सर्व शिक्षा अभियान की थीम ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ तब तक सार्थक सिद्ध नहीं होगी, जब तक हमारे समाज से गरीबी व बेरोजगारी खत्म नहीं होगी।
सुधीर कुमार, गोड्डा, झारखंड

सचिन के बोल

सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा में लिखी गई बातें सौ प्रतिशत सही हैं, क्योंकि तेंदुलकर किसी तरह की लोकप्रियता के भूखे नहीं हैं। उन्हें जो सम्मान चाहिए था, वह उन्हें अपने बल्ले से मिल चुका है। उनके योगदान को भारत सरकार सराह और नवाज चुकी है। भारतीय क्रिकेट प्रेमी तो आज भी उन्हें ‘क्रिकेट का भगवान’ मानते हैं। इसलिए सचिन तेंदुलकर द्वारा बताई गई बातों में अगर-मगर ढूंढ़ने का सवाल ही नहीं उठता है। यह भी साफ है कि ग्रेग चैपल के दौर में ही भारतीय टीम की सबसे खराब हालत हुई थी। एक अच्छे कप्तान सौरव गांगुली को टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था और बाकी सबके प्रदर्शन खराब हो चुके थे। इसलिए बीसीसीआई को इस किताब से सीख लेने की जरूरत है।
गंगदीप राना, पटेल नगर, दिल्ली

जिल्लत की जिंदगी

आज देश में कई सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं बेटियों को बचाने और उन्हें सम्मान तथा हक दिलाने की मुहिम चला रही हैं। लेकिन क्या इन सबका असर समाज पर पड़ रहा है? क्या लड़कियों को समाज में वह दर्जा मिल रहा है, जिसकी वे हकदार हैं? शायद नहीं। आज भी लड़कियों की आवाज दबाने की कोशिश की जाती है। अपने जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक, लगभग हर लड़की को हमारा सभ्य समाज यह एहसास दिलाने की कोशिश करता है कि वह अबला लड़की है। अगर हम अपने समाज में देखें, तो बलात्कार, घरेलू हिंसा, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रताड़ना जैसी घटनाएं घटती रहती हैं। ज्यादातर लड़कियां ऐसी किसी यातना से गुजर ही जाती हैं कि उनकी जिंदगी जिल्लत भरी हो जाती है।
विवेकानंद विमल, पाथरोल, मधुपुर

बेखौफ हैं बदमाश

दिल्ली पुलिस का अपना नाम-काम है। परंतु पिछले कुछ दिनों में जिस तरह हमारे बहादुर सिपाहियों की हत्याएं हुई हैं, उनसे ऐसा लगता है कि बदमाशों में वर्दी का खौफ कम हो गया है। हमारे सिपाही अपनी जान की बाजी लगाकर बदमाशों से और यहां तक कि आतंकियों से लोहा लेते हैं, लेकिन न्याय-प्रणाली का लचीलापन इन तत्वों को बेखौफ बना देता है। अदालतों में विचाराधीन मामलों से उनका दुस्साहस बढ़ता है। इसलिए न्याय-प्रणाली को संगीन मामलों को तुरंत निपटाना चाहिए। यदि किसी पुलिसकर्मी पर आपराधिक तत्वों का हमला होता है, तो उसका संदेश आम जनता में गलत ही जाएगा। जब पुलिसकर्मी ही निशाना बनेंगे, तो जनता सुरक्षित कैसे होगी? सरकार को चाहिए कि जान की बाजी लगाकर समाज की रक्षा करने वाले बहादुर सिपाहियों का मनोबल बढ़ाए, उनकी मौत पर उनके परिवार को उचित मुआवजा दे और उनके परिवार के किसी सदस्य को नौकरी दे।
शरद चंद्र झा, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

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