DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

राम तजूं पै गुरु न बिसारूं!

फर्क क्या है पुरुष और स्त्री में? फर्क इतना ही होगा कि पुरुष में पुरुष ऊपर होगा, स्त्री भीतर छिपी होगी। स्त्री गहरे में होगी, पुरुष परिधि पर होगा। स्त्री में फर्क यह होगा कि स्त्री ऊपर होगी, पुरुष नीचे दबा होगा। और जब तुम मुक्तहोओगे, जब तुम्हारी चेतना अपने शांत केंद्र की तरफ वापस लौटेगी तो जो छिपा है, वह प्रकट होगा। जो प्रकट था, वह तो था ही, अब तक जो छिपा रहा था, वह भी प्रकट होगा। इसलिए फरीद कहता है, ‘आशिक माशूक हो जाते हैं।’ उस आखिरी घड़ी में अचानक तुम पाते हो कि पुरुष तो मैं था, लेकिन अब कुछ नया घट रहा है। भीतर एक नया द्वार खुल रहा है, जो अब तक बंद पड़ा था। और स्वभावत: जो अब तक प्रकट न हुआ था, उसकी ताजगी बड़ी होती है। जब छिपा हुआ अचानक प्रकट होता है, पुरुष में जब स्त्री प्रकट होती है- मुक्ति के क्षण के करीब, आत्म-केंद्र के करीब, तब पुरुष को बिल्कुल आच्छादित कर लेती है। इसलिए बुद्धपुरुष स्त्रैण हो जाते हैं। बुद्धत्व को उपलब्ध स्त्रियों में बड़े पुरुष का भाव पैदा होता है।

स्त्रैण-चित्त की थोड़ी सी बातें समझ लें, फिर सहजो-वाणी को समझना आसान हो जाएगा। पहली बात, स्त्रैण-चित्त की अभिव्यक्तिध्यान की नहीं, प्रेम की है। उसे ध्यान प्रेम से ही उपलब्ध होता है। वह प्रेम से ही सराबोर है। उसके लिए ध्यान का नाम प्रार्थना है। पश्चिम की भाषाओं में ‘समर्पण’ के लिए जो शब्द है, उसमें वह भाव नहीं है, जो पूरब की भाषाओं में है। ‘सरेंडर’- उससे खबर मिलती है कि तुम हार गए। पश्चिम में सरेंडर का अर्थ होता है- किसी ने तुम्हें हरा दिया और झुका दिया। पूरब में अर्थ होता है समर्पण का- तुम हारे और झुके, किसी ने झुकाया नहीं। पश्चिम की भाषाएं पुरुष से प्रभावित हैं, बहुत ज्यादा। पूरब की भाषाएं स्त्री से बहुत प्रभावित हैं। इसलिए पूरब की भाषाओं में जितना महत्वपूर्ण है, वह तुम सब स्त्रैण पाओगे। ममता, करुणा, अहिंसा, दया, प्रार्थना, पूजा, अर्चना सब स्त्रैण शब्द हैं। जो भी सुकोमल है, माधुर्य भरा है, उसे हमने ‘स्त्रैण’ शब्द दिया है। उसमें कुछ स्त्री का गुण है।

पुरुष जब परमात्मा की बात करता है, तब गुरु की बात करती है स्त्री, क्योंकि परमात्मा तो बहुत दूर है, गुरु बहुत पास है। स्त्री के लिए गुरु ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, परमात्मा से भी। सहजो का वचन बड़े नास्तिक का मालूम पड़ता है, ‘राम तजूं पै गुरु न बिसारूं!’ मुझे कुछ अड़चन नहीं है राम के त्यागने में, लेकिन गुरु को छोड़ना असंभव है। पुरुष को यह कहने में थोड़ी सी हिचक होगी। वह कहेगा कि गुरु को तो छोड़ना ही है, परमात्मा को ही पाना है। एक दिन तो गुरु को छोड़ना ही पड़ेगा और परमात्मा से मिलन करना होगा। स्त्री कहेगी, अगर परमात्मा को ही मिलना है तो गुरु में ही आ जाए।

पुरुष को प्रेम में भी बंधन लगता है, स्त्री को प्रेम में मुक्ति लगती है। गुरु न तजूं हरि को तज डारूं। परमात्मा को छोड़ भी सकती हूं, गुरु को नहीं छोड़ सकती। स्त्रियां परम भक्त और परम शिष्य हो पाईं, वह उनके लिए सहज है। इससे तुम यह मत समझना कि पुरुष में कुछ विशेषता है, इसलिए गुरु हो पाया। शिष्य होना भी उतना ही महान है, जितना गुरु होना। पूर्ण रूप से शिष्य हो जाना उसी ऊंचाई पर पहुंच जाना है, जिस पर पूर्ण गुरु होकर कोई पहुंचता है। गुरु वे व्यक्ति बन पाते हैं, जिन्होंने ध्यान से उपलब्धि की है। भक्त, शिष्य वे व्यक्तिबन पाते हैं, जो प्रेम के मार्ग से चले हैं। गुरु का मतलब है- जो दूसरे को रास्ता बता सके, दूसरे को रास्ता सिखा सके।

प्रेम डूबने जैसा है। अहंकार को मिटाना है- समय लगेगा, अहंकार को झुकाना है- अभी झुका सकते हो। अहंकार मौजूद है, सिर्फ झुकाने की बात है। स्त्रैण-चित्त सरलता से झुक जाता है। स्त्रियां ऐसे हैं, जैसे वृक्षों पर चढ़ी हुई लताएं। झुकाव आसान है। वृक्ष के लिए झुकना मुश्किल है, लता को झुकने में क्या लगता है। इसलिए सहजो बाई का पहला सूत्र ठीक से समझ लो। वह सूत्र है- प्रेम का। 
‘राम तजूं पै गुरु न बिसारूं।
गुरु को सम हरि को न निहारूं॥’


और मैं मानता हूं कि अगर परमात्मा सहजो के सामने उपस्थित होगा तो वह सहजो का आदर करेगा- गुरु से थोड़ा नीचे बैठेगा। प्रेमियों की बात को तुम तर्क से मत तौलना। प्रेमी कहते कुछ हैं, कहना कुछ और चाहते हैं। प्रेमी कहते कुछ और हैं, कह कुछ और देते हैं। प्रेमियों का वार्तालाप बड़ा परोक्ष है। सहजो को अगर संक्षिप्त में हम कर लें, तो वह यह कह रही है कि तुम मेरे गुरु में विराजमान ही हो गए हो। अब और गुरु से अतिरिक्त और पृथक तुम्हें देखने का कोई उपाय नहीं है। या तो गुरु परमात्मा हो गया है या परमात्मा गुरु हो गया है।
‘बिन घन परत फुहार’ पुस्तक से।
सौजन्य: ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:राम तजूं पै गुरु न बिसारूं!