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अठारह वर्ष में दो पैसे की सिद्धि!

रामकृष्ण परमहंस की ख्याति से एक कथित योगी बहुत ईष्र्या रखता था। एक दिन उसने परमहंस को नीचा दिखाने की ठानी। वह उनके पास पहुंचा और बोला- क्या तुम्हारे पास कोई चमत्कार है या फिर व्यर्थ में ही परमहंस कहलाते हो? रामकृष्ण ने जवाब दिया- नहीं भाई! मैं तो अति साधारण व्यक्ति हूं। मेरे पास कहां चमत्कार की शक्ति है? योगी ने फिर ताना दिया- परमहंस हो न, तो फिर पानी पर चल कर दिखाओ। ईसा मसीह भी पानी पर चे थे। हनुमान जी ने एक ही छलांग में समुद्र पार कर लिया था। सामने ही गंगा नदी बह रही है। इसके जल पर चल कर दिखाओ तो मैं मानूं कि तुम सच्चे अर्थों में परमहंस हो। रामकृष्ण ने सरल वाणी में कहा- नहीं, मैं पानी पर नहीं चल सकता, क्योंकि परमेश्वर की ऐसी इच्छा ही नहीं है। मैं भा उसकी इच्छा के विपरीत कैसे जा सकता हूं? मगर यही बात मैं आपसे भी जानना चाहता हूं कि क्या आप पानी पर चल सकते हैं? योगी ने गरजते स्वरों में कहा- अठारह साल, पूरे अठारह साल मैंने हिमाय पर घोर तपस्या की है, तब कहीं जाकर मैंने यह शक्ति प्राप्त की है कि आज मैं इस गंगा नदी पर इस पार से उस पार तक चल सकता हूं। यह दैवी शक्ति है और यह ऐसे ही उपलब्ध नहीं हो जाती। अब तुम यह परमहंस का पाखंड छोड़ दो। परमहंस तो केव चमत्कारी पुरुष ही हो सकते हैं।

उसकी गर्वोक्ति सुन कर रामकृष्ण परमहंस अत्यंत शांत भाव से बोले- मेरे भाई! अठारह साल तुमने व्यर्थ ही गंवाए। मुझे तो जब गंगा के इस पार से उस पार जाना होता है तो मांझी को आवाज देता हूं। वह नाव से मात्र दो पैसे में नदी पार करा देता है। तो जरा विचार करो कि अठारह साल में यदि तुमने नदी के पानी पर चल कर उसे पार करने की सिद्धि प्राप्त की है तो वह कमाई क्या दो पैसे से अधिक है? रामकृष्ण का जवाब सुन कर योगी निरुत्तर हो गया और सिर झुकाए वहां से चला गया। सच ही तो है कि सिद्धि थोथे चमत्कारों में निहित नहीं होती, वह तो परोपकार में बसी होती है।

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