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महाभारत के समय का मंदिर

मनियार मठ राजगीर का आदि धर्म तीर्थ स्थल है। यह राजगीर के ब्रह्मकुंड से शांति स्तूप जाने के मार्ग में पड़ता है। यह एक बेलनाकार मंदिर है। यह राजगृह के देवता मणिनाग का मंदिर बताया जाता है। पाली ग्रंथों में इसे मणिमाला चैत्य कहा गया है, जबकि महाभारत में मणिनाग मंदिर का उल्लेख आता है। इसलिए मंदिर के बारे में स्थानीय लोग कहते हैं कि यह महाभारत कालीन है। लोग इसे महाभारत कालीन राजा जरासंध के समय का बना हुआ बताते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो इस मंदिर में राजगृह के राजा महाराज जरासंध पूजा किया करते थे। महाभारत में आपने पढ़ा होगा कि जरासंध के कृष्ण के मामा कंस से वैवाहिक संबंध थे। कंस का साथ देने के कारण कृष्ण के कहने पर भीम ने जरासंध को गदायुद्ध में पराजित कर मार डाला था।

मंदिर की संरचना कूप (कुएं) जैसी है। इसका व्यास 3 मीटर और दीवार 1.20 मीटर मोटी है। इसकी बाहरी दीवार पर पुष्पाहार से सजे देवताओं की आकृतियां बनी हैं। इनमें शिव, विष्णु, नाग लपेटे गणेश जैसी आकृतियां हैं। छह भुजाओं वाले नृत्यरत शिव की आकृति प्रमुख आकर्षण है। इनमें कई मूर्तियां नष्ट हो चुकी हैं। कला शैली की दृष्टि से इतिहासकार इन मूर्तियों को गुप्तकालीन बताते हैं। कुंड, चबूतरे और मुख्य मंदिर के आसपास भी कई कलाकृतियां हैं। वैदिक धर्म के बाहर की जनजातियों में सर्प पूजन की परंपरा थी। मगध के लोग नागों को उदार देवता मानते थे, जिन्हें वे पूजा आदि करके संतुष्ट करते थे।

ऐसा माना जाता था कि नाग देवता प्रसन्न होंगे तो बारिश अच्छी होगी, परिणामस्वरूप फसल भी अच्छी होगी। मनियार मठ में खुदाई से ऐसे बहुत से पात्र मिले हैं, जिनमें सांपों के फन के आकार के कई नलके बने हैं। संभवत: इन पात्रों से सांपों को दूध पिलाया जाता था। यहां विशाल गड्ढों में जानवरों के कंकाल भी मिले हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि कभी यहां बलि भी दी जाती रही होगी। मनियार मठ स्थित मंदिर के गर्भ गृह में जाने के लिए आपको कई सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। आज भी इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मन्नत मांगते हैं।

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