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मौसम पूर्वानुमान के लिए नया मॉडल विकसित होगा

मौसम विज्ञानी व भारत मौसम विज्ञान केन्द्र,पुणे के एग्रोमेट विभाग के निदेशक डा.एन चट्टोपाध्याय की मानें तो देश के मौसम पर ग्लोबल वार्मिग के प्रभाव के बाबत अब तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं। मौसम में काफी अधिक उतार-चढ़ाव के लिए बहुत अधिकशहरीकरण, औद्योगिकीकरण व वनों की कटाई प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। इस वजह से पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड व नाइट्रोजन गैस घुल रहा है। भूजल का अत्यधिक दोहन भी मौसम को प्रभावित कर रहा है।ड्ढr ड्ढr भारत मौसम विज्ञान विभाग के पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने आए डा. चट्टोपाध्याय ने ‘हिन्दुस्तान’ से बातचीत करते हुए बताया कि मौसम का पूर्वानुमान करने के लिए नया मॉडल बनाया जा रहा है। अमेरिका,इंग्लैंड आदि के मॉडल के साथ भारतीय मॉडल का अध्ययन कर नया मॉडल विकसित किया जा रहा है। उन्होंने स्वीकार किया कि विभाग सही-सही मौसम की भविष्यवाणी करने में समर्थ नहीं हो पा रहा है। जलवायु काफी परिवर्तनशील है। कभी बढ़ जाता है तो कभी घट जाता है। कृषि उत्पादन में आयी कमी की प्रमुख वजह यही है। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2020 तक कृषि उत्पादन मेंबीस फीसदी की कमी हो जाएगी। अब जिलावार व पांच दिन मौसम का पूर्वानुमान शुरू किया जा रहा है।ड्ढr देशभर में बारिश मापने के चार हजार मशीनें लगायी जाएंगी। हर जिला में कम से कम पांच -छह मशीनें लगेंगी। साथ ही 250 एग्रोमेट स्टेशन खोले जाएंगे। इससे कृषि उत्पादन में आयी कमी को काफी हद तक पाटा जा सकता है।ड्ढr सही समय पर डाटा नहीं मिलने से मौसम की सही-सही जानकारी देने में परशानी होती है। जिलावार मौसम व कृषि संबंधी आंकड़े नहीं मिल पाते हैं। इसमें सुधार लाने के लिए आधुनिक तकनीकों का सहारा लेना पड़ेगा। कृषि विभाग,मौसम विभाग,विज्ञान व तकनीकी विभाग आदि के बीच बेहतर तालमेल बनाने की जरूरत है।ं

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