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छोटी सी अटैची के साथ 1998 में रामपुर आए थे मुख्तार अब्बास नकवी

बेशक, राहे सियासत पर उन्होंने 1980 में कदम रखा लेकिन, राजनीति में उनकी किस्मत का सितारा रामपुर की सरजमीं पर चमका। सोलह साल पहले छोटी सी अटैची के साथ रामपुर की जमीं पर कदम रखने वाले मुख्तार अब्बास नकवी को यहां के मतदाताओं ने हाथों हाथ लिया। जिस मंशा से भाजपा ने बाहर के प्रत्याशी पर दावं खेला, वह कामयाब रहा और यहीं से नकवी सियासत में मजबूत पकड़ बनाने में कामयाब हुए। नतीजतन, लोकसभा का चुनाव हारने बाद भी पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा और एक बार फिर उन्हें केंद्र सरकार के मंत्रीमंडल में राज्यमंत्री बनाया है।


इलाहाबाद के भदरी में वर्ष 1957 में जन्मे मुख्तार अब्बास नकवी यूं तो आपातकाल के दौरान 1975-77 में जेल भी रहे लेकिन, सियासत में उनका पहला कदम वर्ष 1980 में विधानसभा चुनाव में इलाहाबाद पश्चिम सीट से उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। 1989 में अयोध्या और 1991 में मऊ विधानसभा क्षेत्र से चुनावी समर में ताल ठोंकी। लेकिन, शायद उनकी किस्मत में प्रदेश के बजाय केंद्रीय सियासत थी, सो वर्ष 1998 में रामपुर से भाजपा ने उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया।

तब नकवी को रामपुर में कोई नहीं जानता था। वह ट्रेन से इलाहाबाद से रामपुर जिस वक्त आए, कुर्ता-पायजामा पहने हुए थे और छोटी सी अटैची हाथ में थी, जानकारों की मानें तो कुर्ता एक जगह से हल्का सा फटा हुआ भी था। पूर्व राज्यमंत्री शिव बहादुर सक्सेना तथा उस वक्त के चंद भाजपाइयों ने उन्हें स्टेशन पर रिसीव किया था। तब से उनकी किस्मत का ऐसा सितारा चमका कि वह रामपुर का गौरव बनते चले गए और रविवार को दूसरी मर्तबा उन्हें राज्यमंत्री बनाया गया।
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4966 मतों से विजयी हुए थे नकवी
वर्ष 1998 में मुख्तार अब्बास नकवी ने भाजपा प्रत्याशी के रूप में रामपुर लोकसभा से ताल ठोंकी थी। उन्होंने कांग्रेस की महताब जमानी बेगम उर्फ नूरबानो को 4966 मतों से शिकस्त दी थी। नकवी को उस वक्त कुल 265116 मत मिले थे जबकि, नूरबानो को 260150 वोट मिले थे। हालांकि, वर्ष 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में नकवी 115471 मतों से नूरबानो से हार गए थे।
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चुनाव हारे तो भेज दिया राज्यसभा
केंद्रीय नेतृत्व में उनकी पकड़ ही कहा जाएगा कि लोकसभा का चुनाव हारने के बाद उन्हें वर्ष 2001-2003 में सीसीआरटी का चेयरमैन बता दिया गया और वर्ष 2002 में उन्हें यूपी से राज्यसभा सदस्य बनाया गया। इतना ही नहीं वर्तमान में तीसरी दफा भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं।
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मुस्लिम चेहरा होने का भी मिला लाभ
यह बात अलग है कि नकवी की भाजपा के प्रथम पंक्तियों के नेताओं में अच्छी पकड़ है लेकिन, इस पकड़ के पीछे कहीं न कहीं उनका मुस्लिम चेहरा भी है। शिया मुस्लिम होने के चलते भी भाजपा उन्हें चुनाव हारने के बाद भी मजबूती देती रही। विरोधी भले ही साम्प्रदायिकता का ठप्पा भाजपा पर लगाते रहे हों लेकिन, नकवी को दी गई यह मजबूती कहीं न कहीं मुस्लिम मतदाताओं के बीच भाजपा की निष्पक्ष छवि को बयां करती है।
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 सियासी ही नहीं लेखक भी हैं नकवी
ये कम ही लोग जानते हैं लेकिन, हकीकत है। राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी सिर्फ राजनैतिक व्यक्ति ही नहीं हैं वह लेखक भी हैं। राज्य सभा के स्नोत के अनुसार वर्ष 1991 में उन्होंने स्याह, 1997 में दंगा और वर्ष 2007 में वैसाली नाम की पुस्तक लिखी है।

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