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प्रेरणा मत तलाशिए, बस काम में लग जाइए

अमेरिका के फाइनेंशियल एनालिस्ट व लीडरशिप ट्रेनर हैं। 18 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘मुझे प्रेरणा की आवश्यकता है’- यह एक ऐसा वाक्य है, जिसे मैं कई लोगों से सुनता हूं। बातचीत कुछ इस तरह के वाक्यों से शुरू होती है- ‘मैं वास्तव में फिट होना चाहता हूं, लेकिन मन में प्रेरणा ही नहीं जगती’ या ‘मैं वास्तव में अपने काम और जीवन में संतुलन बनाना चाहता हूं, लेकिन कभी भी ऐसा नहीं कर पाता’ या फिर ‘मुझे पता है कि प्लानिंग करनी चाहिए, लेकिन मैं खुद को प्रेरित नहीं कर पाता’ ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं, पर आप मेरा अभिप्राय समझ गए होंगे।

मुझे सबसे दिलचस्प यह लगता है कि ये बातें वैसे लोगों द्वारा कही जाती है, जो अपनी जिंदगी के दूसरे पक्षों में सफल हैं! इसलिए ऐसा कैसे हो सकता है कि वे अपनी जिंदगी के किसी पक्ष में सफल हो सकते हैं और दूसरे पक्षों या उन क्षेत्रों में सफल नहीं हो सकते, जिनमें वे बदलाव लाना चाहते हैं।

यह सवाल प्रेरणा की तलाश में होने से नहीं जुड़ा है और गलत जगह पर और गलत सवाल का परिणाम तलाशने का मतलब है कि हमें हमेशा वही मिलेगा, जो हम नहीं चाहते। जब मैं अपने उन क्लाइंट के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम करता हूं, जो श्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहते हैं तो मैं हमेशा इसी तथ्य को कहता हूं कि बदलाव केवल तभी आता है, जब हम जो कर रहे होते हैं, उसमें बदलाव लाते हैं और हम उसे कैसे करने की कोशिश करते हैं। यह सुनने में आसान लगता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि रास्ते में कौन बाधा खड़ी कर देता है?

हमारा मस्तिष्क।
सबसे अच्छा और स्पष्ट उदाहरण है- ‘मैं फिट होना चाहता हूं, पर नहीं लगता कि मैं कभी यह कर पाऊंगा।’ यदि पूछो कि वे ऐसा क्यों सोचते हैं, तब जवाब सामने आएंगे, ‘ पहले जिस दिन जाना था पूरा दिन निकल गया और समय नहीं मिला’, ‘जब जगा तो काफी थका हुआ महसूस कर रहा था, या ‘मुझे मेरे जिम वाले जूते ही नहीं मिल रहे हैं’, ‘बारिश हो रही थी तो सोचा कल करेंगे’ आदि। ऐसे बहानों के साथ लोग कहते हैं- ‘मुझे प्रेरणा की जरूरत है।’आखिर यहां क्या घटित हुआ?
दिमाग ने दखल दिया और चीजों को अपने नियंत्रण में ले लिया। अगर आप जीवन बदलना चाहते हैं तो अपने दिमाग पर काबू करना होगा, इसका शिकार होने से बचना होगा। सफलता के लिए खुद को तैयार करना होगा और अपने दिमाग को रास्ते से हटाना होगा। आपमें प्रेरणा का अभाव नहीं है, बस तय करना है कि आप क्या चाहते हैं और क्यों चाहते हैं। और बस यही संकल्प वह प्रेरणा है, जिसकी जरूरत है। आप अपना लक्ष्य पूरा कर सकें, यह सुनिश्चित करने के लिए आपको एक प्रकिया की आवश्कता है।

अब जिम के उदाहरण की ओर लौटते हैं। तो अब आपको क्या करने की आवश्यकता है?
’  तय करें कि आप कब और कहां जा रहे हैं। इसे डायरी में नोट कीजिए, जैसे किसी दूसरे अप्वाइंटमेंट को नोट करते हैं।
’  अपनी तैयारी रात में ही पूरी करें, ताकि सुबह सोचना न पड़े।
’   एक प्रशिक्षक या पार्टनर को अपने सहयोग के लिए नियुक्त कीजिए।
’   हर प्रशिक्षण सत्र के लिए एक विशिष्ट योजना बनाइए, ट्रेनर की मदद से अपना व्यायाम शेड्यूल निश्चित कर लीजिए।
’   अपनी प्रगति पर नजर रखने के लिए लक्ष्य निर्धारित करें। इतना वजन कम करना है, इतनी दूरी तक दौड़ना है या कोई
अन्य लक्ष्य।
मेरा अनुमान है कि आप कई पहलुओं में काफी प्रेरित हैं। आपकी बाधा यह है कि आपने अपने दिमाग को अपने साथ खेल खेलने दिया। उसके बहानों को खुद पर हावी किया।

यहां उदाहरण के लिए मैंने फिटनेस के बारे में बात की, लेकिन यह बात हमारे जीवन के सभी पहलुओं पर लागू होती है। हम बिना खुद पर भरोसा किए, बिना चीजों की पूरी तैयारी किए, मन ही मन गलत धारणाएं बना लेते हैं। जैसे सेल्सपर्सन यह सोचकर कॉल नहीं करते  कि ‘ग्राहकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए सोमवार की सुबह का समय सही नहीं होता’ या ‘मार्केट अभी खराब है’।

तो श्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए प्रेरणा की नहीं, खुद को हरकत में लाने की जरूरत है। अपने दिमाग को काबू में करना है। काम को टालने वाले विचारों के बैरियर, जो रास्ते में आ सकते हैं, उनको तोड़ने के लिए आपको बस कुछ पलों की आवश्यकता है।
क्या आपको प्रेरणा की आवश्यकता है? नहीं! क्या कार्य योजना और दिमाग पर नियंत्रण करने की आवश्यकता है? हां!!!

खुद को बदलने की ताकत है आपमें
हम यूं ही तो नहीं कहने लगते कि मुझमें फलां-फलां कमियां हैं। पीछे मुड़कर देखने पर कोई न कोई घटना याद आती है और हम कहते हैं कि उस दिन मुझे लगा ..। धीरे-धीरे यही विचार मजबूत धारणा बनकर जीवन को बदलने लगते हैं और हम खुद के प्रति हीन भावनाओं में कैद हो जाते हैं। यह भूल जाते हैं कि हम अपने विचारों के गुलाम नहीं, बल्कि उन्हें काबू में रखने वाले मास्टर हैं।

सकारात्मक स्वीकृति के साथ प्रश्न पूछें
दिमाग का स्वभाव है कि उससे कोई प्रश्न पूछो तो वह तुरंत उसका उत्तर खोजने लगता है। ऐसे में यदि सवाल सकारात्मक होगा तो जवाब भी वैसा ही मिलेगा। आपका फोकस वहां पर बना रहेगा, जहां आप जाना चाहते हैं।   

क्या करें:  भले ही स्वीकारना मुश्किल हो, पर अपनी कमी से जुड़ा सकारात्मक प्रश्न पूछें, जैसे क्यों मैं आसानी से वजन कम कर पा रही हूं या क्यों मैं अमीर हूं। हर रोज दोहराएं। तुरंत सही उत्तर न तलाशें। दिमाग को स्वयं जाग्रत होने दें।

पूर्व धारणा को छोड़ा 
पहले ऐसा हुआ है तो आगे भी ऐसा ही होगा, यह सोचना भविष्य में आगे बढ़ने से रोकता है। यह विश्वास करना शुरू करें कि आप वह काम कर सकते हैं।

क्या करें: बदलाव के लिए तैयार रहें। अपना ध्यान सकारात्मक एटिट्यूड विकसित करने पर लगाएं, जैसे लंबी बीमारी का उपचार करा रहा व्यक्ति सोचे कि मैं यह धारणा बदल रहा हूं कि मैं ठीक नहीं हो सकता..

विरोध को रोकें
जब आप बदलाव की कोशिश करते हैं तो दिमाग का एक हिस्सा रोकता है। यह बदलाव का डर होता है। जैसे कुछ को डर होता है कि असफल हो गया तो लोग क्या कहेंगे।  

क्या करें: अपने भीतर एक ऐसा कोना विकसित करें, जहां आप खुद को सफल मान चुके हों। खुद को शाबाशी दें, स्वीकार करें। अपने मन को मजबूत बनाएं।

विरोध को रोकें
जब आप बदलाव की कोशिश करते हैं तो दिमाग का एक हिस्सा रोकता है। यह बदलाव का डर होता है। जैसे कुछ को डर होता है कि असफल हो गया तो लोग क्या कहेंगे।  

क्या करें: अपने भीतर एक ऐसा कोना विकसित करें, जहां आप खुद को सफल मान चुके हों। खुद को शाबाशी दें, स्वीकार करें। अपने मन को मजबूत बनाएं।

उद्देश्य खोजें
अपेक्षा न करें, उद्देश्य खोजें। इससे ध्यान इस लक्ष्य तक कैसे पहुंचेंगे, इस पर रहेगा। आप समस्या का हल ढूंढ़ने में समय देंगे।
उदासी को यूं करें दूर
’    मेरे पास यह नहीं है: सोचें कि खुश होने के लिए यही जरूरी नहीं है।
’    अब देर हो चुकी है: आज ही इस काम को करने का सही समय है।
’    मैं कमजोर हूं: जितना सोचता हूं, उससे कहीं अधिक मजबूत हूं।
’    मैं भाग्यशाली होता यदि: भाग्यशाली हूं कि मैं जीवित और आजाद हूं।
’    मैं टूट चुका हूं: मैं हर रोज उबर रहा हूं।
’    मैं यह काम नहीं जानता: कहीं न कहीं से शुरुआत होती है। कोशिश         करूंगा तभी अपनी प्रतिभा को जान पाऊंगा।

सुन्दर लोगों के लिए जरूरी है आईना देखना
दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरूप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ में लिए अपना चेहरा देख रहे थे। तभी उनका एक शिष्य कमरे में आया। सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा। वह बोला कुछ नहीं, सिर्फ मुस्कराने लगा। विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट समझ गए और कुछ देर बाद बोले, ‘मैं तुम्हारे मुस्कराने का राज समझ रहा हूं। शायद तुम सोच रहे हो कि मुझ जैसा कुरूप आईना क्यों देख रहा है?’

शिष्य कुछ नहीं बोला, उसका सिर शर्म से झुक गया। सुकरात ने कहा, ‘शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूं।’ शिष्य ने कहा, नहीं।

सुकरात बोले, ‘मैं कुरूप हूं, इसलिए रोज आईना देखकर मुझे अपनी कुरूपता का भान होता है। इसलिए कोशिश करता हूं कि अच्छे काम करूं, ताकि मेरी यह कुरूपता ढक जाए।’
शिष्य को यह जवाब अच्छा लगा। फिर उसने एक शंका प्रकट की, ‘गुरुजी इस तर्क के अनुसार सुंदर  लोगों को आईना नहीं देखना चाहिए?’
सुकरात बोले, ‘ऐसी बात नहीं। उन्हें भी आईना अवश्य देखना चाहिए, ताकि उन्हें यह ध्यान रहे कि वे जितने सुंदर दिखते हैं, उतने ही सुंदर काम करें। ऐसा कुछ न करें कि बुरे काम उनकी सुंदरता को ढक लें। सूरत से अधिक सीरत की कुरूपता अधिक दुखदायी होती है।’
शिष्य अब समझ चुका था कि सुंदरता मन व भावों में दिखती है। शरीर की सुंदरता तात्कालिक है, जबकि मन और विचारों की सुंदरता की सुगंध दूर-दूर तक फैलती है।

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