DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अस्तित्व की पहेली

हमारा अस्तित्व है, और हमारे आसपास की दुनिया का भी है। अगर हम अद्वैत वेदांत के आधार पर दुनिया को ‘माया’ मानें, तब भी ‘माया’ की तरह तो हमारा अस्तित्व है ही। शंकराचार्य भी कहते हैं कि दुनिया का पारमार्थिक अस्तित्व नहीं है, लेकिन व्यावहारिक अस्तित्व होता है। विज्ञान तो भौतिकवादी होता है और उसमें इस सवाल की जगह नहीं होनी चाहिए थी। पहले यह सवाल था भी नहीं, लेकिन अब यह बात वैज्ञानिक भी कहने लगे हैं कि आखिरकार इस ब्रह्मांड का अस्तित्व क्यों है और इसमें जीवन कैसे पैदा हो गया? क्या हम किसी दुर्लभ संयोग से अस्तित्व में आ गए हैं? इन सवालों से आमने-सामने होने की कई वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह विज्ञान के दो सबसे बड़े सिद्धांतों के विरोधाभास में हैं। आधुनिक विज्ञान को बदल डालने वाला एक सिद्धांत अल्बर्ट आइंस्टाइन का सापेक्षता का सामान्य सिद्धांत है। इससे हम ब्रह्मांड की घटनाओं की व्याख्या कर सकते हैं, यानी स्पेस, समय, गुरुत्वाकर्षण, निहारिकाएं, सितारे, ग्रह वगैरह के कामकाज को समझाने में यह सिद्धांत सबसे महत्वपूर्ण है। दूसरा सिद्धांत है क्वांटम सिद्धांत, जिसने भौतिकवाद की दुनिया बदल दी। क्वांटम भौतिकी के आधार पर हम परमाणु और उनसे भी सूक्ष्म कणों और उनके स्तर पर ऊर्जा के बारे में समझते हैं।

ये दोनों सिद्धांत आपस में काफी हद तक मेल खाते हैं, लेकिन बहुत हद तक दोनों का सामंजस्य बिठाने की वैज्ञानिकों की हर कोशिश नाकाम रही है। एक ओर वैज्ञानिक सावधानी से दोनों के मेल खाने वाले तत्वों को चुनकर उनका इस्तेमाल दुनिया के तमाम रहस्यों को समझने में करते हैं। लेकिन जब क्वांटम भौतिकी के नियमों को विराट ब्रह्मांड पर लागू करने की कोशिश की गई, तो वैज्ञानिकों ने पाया कि इन नियमों के मुताबिक तो जीवन का अस्तित्व संभव ही नहीं है। क्वांटम भौतिकी के हिसाब से ब्रह्मांड में कुल जितनी ऊर्जा है, वह जरूरत के लाखों-करोड़ों-अरबों-खरबों अंश से भी कम है। इसी तरह हिग्ज-बोसान, जो हमारे समूचे ब्रह्मांड में पदार्थ की उपस्थिति का आधार है, जरूरत से कई खरब गुना छोटा है। लेकिन अगर इन स्थिरांकों को जरा भी ऊपर-नीचे करें, ताकि हिसाब सही बैठ जाए, तो यह दुनिया तो बन जाती है, लेकिन वह जीवन के लिए उपयोगी नहीं हो सकती। ये सारे समीकरण बहुत जटिल हैं और हम जैसे आम लोगों की समझ के परे हैं, लेकिन वैज्ञानिक इस बात से भी जूझ रहे हैं कि क्या यह संयोग मात्र है कि इतने नाजुक संतुलन वाले स्थिरांकों वाली ही दुनिया बनी, जिसमें जीवन संभव हुआ। यह संभावना तो खरबों में से एक है, तो क्या हमारा अस्तित्व इतने दुर्लभ संयोगों पर आधारित है? यह तकरीबन असंभव है।

विख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग और एलन ग्रुथ ने इस समस्या पर काम किया है और कई अन्य वैज्ञानिक भी इस समस्या से जूझ रहे हैं। इन लोगों की अवधारणा यह है कि बिग बैंग के बाद एक नहीं, बल्कि असंख्य ब्रह्मांड बने, जैसे पानी में अचानक खलबली होने से बुलबुले बनते हैं, बल्कि इन ब्रह्मांडों का बनना अब भी जारी है। इन सारे ब्रह्मांडों के भौतिक स्थिरांक और नियम अलग-अलग हैं। यानी सभी संभव गुणों और नियमों वाले ब्रह्मांड मौजूद हैं, उनमें से एक हमारा ब्रह्मांड ऐसा है कि जिसके भौतिक गुण जीवन के लिए मुफीद हैं। यह भी मुमकिन है कि ऐसे और कई ब्रह्मांड हों, जिनमें अलग नियमों वाले अलग किस्म के जीव पनप रहे हों, यानी ऐसी कई दुनिया हो सकती हैं, जिनमें हमारे ब्रह्मांड के कोई नियम लागू ही न होते हों। यह बात सिर चकराने वाली लगती है, लेकिन इतने बडम्े वैज्ञानिक कह रहे हैं, तो इसमें दम होना चाहिए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:अस्तित्व की पहेली